सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य पत्रकारों और मीडिया हाउसेस को उनका उचित हक दिलाना है, क्योंकि वही असली कंटेंट तैयार करते हैं, जबकि टेक प्लेटफॉर्म उस पर भारी मुनाफा कमाते हैं।
पहले का कानून और टकराव की शुरुआत
इस पूरी बहस की शुरुआत पुराने ‘News Media Bargaining Code’ से हुई थी। उस समय सरकार ने माना था कि टेक कंपनियों और मीडिया के बीच शक्ति का संतुलन बिगड़ चुका है।
Google और Facebook को न्यूज कंटेंट चाहिए था ताकि यूजर्स प्लेटफॉर्म पर बने रहें
लेकिन मीडिया कंपनियों को अपनी पहुंच के लिए इन प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर रहना पड़ता था
जब पहली बार कानून आया तो मामला काफी गरमा गया था। Google ने सेवाएं बंद करने की धमकी दी, जबकि Meta ने अपने प्लेटफॉर्म से न्यूज कंटेंट ही हटा दिया था।
बाद में हुआ समझौता
तनाव बढ़ने के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। सरकार ने कंपनियों को स्वतंत्र रूप से मीडिया हाउसेस के साथ डील करने की छूट दी।
इस मॉडल का असर भी सकारात्मक रहा:
5 साल में मीडिया कंपनियों को 1 अरब डॉलर से ज्यादा भुगतान मिला
छोटे और बड़े दोनों मीडिया संस्थानों को फायदा हुआ
Meta के इनकार से फिर बढ़ी समस्या
तीन साल बाद स्थिति फिर बदल गई जब Meta ने पुरानी डील्स रिन्यू करने से इनकार कर दिया। कंपनी का कहना था कि उसे न्यूज की जरूरत नहीं है।
यही घटना सरकार के लिए चेतावनी बन गई कि पुराने कानून में खामियां थीं, जिनका फायदा टेक कंपनियां उठा सकती हैं।
नया कानून क्यों है खास?
नया News Bargaining Incentive पहले से ज्यादा सख्त और प्रभावी है:
टेक कंपनियों को न्यूज ब्लॉक करने पर भी भुगतान करना होगा
अब अलग-अलग मीडिया हाउसेस से डील की जरूरत नहीं, सिर्फ 4 मुख्य समझौते पर्याप्त
नियम तोड़ने पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा
अगर कंपनियां नियम नहीं मानतीं, तो उन्हें संभावित डील वैल्यू का 50% अतिरिक्त जुर्माना देना होगा।
मीडिया और लोकतंत्र के लिए बड़ा कदम
सरकार का मानना है कि यह कानून सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन के लिए भी जरूरी है। इससे:
पत्रकारों को उनकी मेहनत का सही मूल्य मिलेगा
छोटे मीडिया संस्थानों को भी फायदा होगा
और टेक कंपनियों की मनमानी पर रोक लगेगी
