नई दिल्ली । सौरभ दास और आशुतोष रांका की जमानत प्रक्रिया में देरी को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और दिल्ली पुलिस के बीच विवाद सामने आया है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि उसके दोनों नेताओं की रिहाई की प्रक्रिया जानबूझकर धीमी की गई और चार जमानतदारों की गारंटी बिना स्पष्ट कारण बताए खारिज कर दी गई। पार्टी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट पर भी निर्धारित समय पर नहीं पहुंचने और सुनवाई नहीं करने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जमानत के लिए गलत बॉन्ड जमा किए जा रहे थे, जिन्हें स्वीकार करना संभव नहीं था। पुलिस के मुताबिक, कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह के अनुसार, वह सुबह 11 बजे से मंदिर मार्ग थाने में मौजूद थीं। उन्हें बताया गया था कि जमानत से संबंधित सुनवाई दोपहर 12 बजे होगी। उनका दावा है कि जमानत की लगभग सभी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी थीं, लेकिन विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट शाम 4 बजकर 42 मिनट तक थाने नहीं पहुंचे थे। उन्होंने यह भी कहा कि शाम 5 बजे तक मजिस्ट्रेट अदालत कक्ष में नहीं आए और वहां पहुंचने के बाद भी जमानत के मामले पर सुनवाई नहीं की गई।
रत्ना सिंह ने प्रक्रिया में देरी को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सरकारी वकील पिछले चार दिनों से उपस्थित नहीं हो रहे थे, लेकिन संबंधित दिन वह मौजूद थे। उनके मुताबिक, कार्यवाही शुरू होने के करीब पांच मिनट के भीतर ही विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अदालत को बताया कि उन्हें धमकी भरा संदेश मिला है। इसके बाद पूरी चर्चा धमकी के मुद्दे पर केंद्रित हो गई।
सीजेपी की लीगल हेड का आरोप है कि इस घटनाक्रम से ऐसा प्रतीत हुआ कि जमानत की आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद दोनों नेताओं की रिहाई के सवाल पर ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया में हुई देरी से वह निराश हैं। हालांकि, जमानत प्रक्रिया में जानबूझकर बाधा डालने के पार्टी के आरोपों को पुलिस ने स्वीकार नहीं किया है।
पार्टी ने यह भी कहा कि यदि आशुतोष रांका और सौरभ दास को अगले दिन तक रिहा नहीं किया गया, तो वह उन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी, जिन पर दोनों नेताओं को अवैध हिरासत में रखवाने का आरोप है। सीजेपी के अनुसार, इस मामले में उसने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से भी कानूनी सलाह ली है। पार्टी का कहना है कि जमानत प्रक्रिया में हुई देरी को लेकर वह कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पार्टी के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि जमानत के लिए ऐसे बॉन्ड जमा किए जा रहे थे, जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता था। अधिकारी के मुताबिक, पुलिस के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है और गलत जमानत बॉन्ड के आधार पर रिहाई की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती।
पुलिस अधिकारी ने यह भी बताया कि रविवार को जमानत प्रक्रिया की सुनवाई के दौरान विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने धमकी भरे संदेश मिलने की जानकारी दी थी। अधिकारी के अनुसार, मजिस्ट्रेट ने कहा कि ऐसी धमकियों और जोखिम के बीच काम करना मुश्किल है। पुलिस ने इसी परिस्थिति को सुनवाई में देरी की वजह बताया है। अधिकारी ने यह भी कहा कि धमकी से संबंधित मामला दर्ज कर लिया गया है और उसकी जांच की जा रही है।
इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। सीजेपी जमानत प्रक्रिया में जानबूझकर देरी और अपने नेताओं को हिरासत में रखे जाने का आरोप लगा रही है, जबकि पुलिस का कहना है कि गलत बॉन्ड जमा होने और मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने के कारण प्रक्रिया प्रभावित हुई। फिलहाल विवाद जमानत संबंधी औपचारिकताओं, सुनवाई में देरी और धमकी के आरोपों के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
