नई दिल्ली । शारदीय नवरात्र का पावन पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना करने के बाद विजयादशमी के दिन देवी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु भावुक मन से मां को विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की प्रार्थना करते हैं। इस साल मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन 20 अक्टूबर को किया जाएगा। देश के विभिन्न हिस्सों में इस परंपरा को धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है।
मां दुर्गा की प्रतिमाओं में कई ऐसी विशेषताएं होती हैं, जिनका संबंध धार्मिक मान्यताओं और प्रतीकों से माना जाता है। इन्हीं में से एक है देवी के माथे पर बिंदी के ठीक नीचे दिखाई देने वाली मकड़ी और उसका जाल। कुछ पारंपरिक प्रतिमाओं में नजर आने वाली यह आकृति सामान्य सजावट भर नहीं मानी जाती, बल्कि इसके पीछे एक विशेष धार्मिक अर्थ जुड़ा हुआ है। यह परंपरा डाकर साज से जुड़ी प्रतिमाओं की सजावट में देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकड़ी का जाल देवी की महामाया शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
महामाया का अर्थ उस दिव्य शक्ति से लगाया जाता है, जो अपनी माया के माध्यम से संसार का संचालन करती है। इस मान्यता में मकड़ी और उसके जाल को जीवन तथा संसार की जटिलताओं को समझाने वाले प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
मकड़ी को महामाया से क्यों जोड़ते हैं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकड़ी अपने भीतर से जाल बनाती है और फिर उसी जाल के बीच रहती है। इसी उदाहरण के माध्यम से मनुष्य के जीवन को समझने का प्रयास किया जाता है। इंसान भी अपने जीवन में परिवार, रिश्तों, इच्छाओं और जिम्मेदारियों के बीच एक व्यवस्था बनाता है। समय बीतने के साथ वह इन्हीं संबंधों और इच्छाओं में इस तरह उलझ सकता है कि उसके लिए उनसे अलग होकर सोचना मुश्किल हो जाता है।
मकड़ी के जाल को इसी सांसारिक उलझन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जिस प्रकार मकड़ी जाल का निर्माण करती है, उसी तरह देवी की शक्ति से इस संसार की माया का संचालन होता है। इसलिए मकड़ी और उसके जाल को मां दुर्गा की महामाया शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। प्रतिमा में यह प्रतीक मनुष्य को संसार की प्रकृति और मोह-माया के प्रभाव की याद दिलाता है।
अपने जाल में कभी नहीं फंसती मकड़ी
मकड़ी से जुड़ी इस धार्मिक व्याख्या का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह अपना जाल बनाती है, लेकिन सामान्यतः उसमें स्वयं नहीं फंसती। इसी उदाहरण के माध्यम से मनुष्य को मोह-माया से बचने का संदेश दिया जाता है। पैसा, परिवार, रिश्ते और जिम्मेदारियां जीवन के आवश्यक हिस्से हैं, लेकिन इनके प्रति अत्यधिक मोह व्यक्ति को मानसिक रूप से उलझा सकता है।
इस मान्यता के अनुसार, मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन में संतुलन बनाए रखना चाहिए। सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाना जरूरी है, लेकिन उनमें इतना नहीं उलझना चाहिए कि व्यक्ति स्वयं को ही भूल जाए। इस प्रकार मकड़ी का प्रतीक जीवन में संतुलन, विवेक और मोह से दूरी बनाए रखने की सीख से जुड़ता है।
दुर्गा विसर्जन कब और किस मुहूर्त में होगा?
पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। इस अवधि में विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा और मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन की परंपरा निभाई जाएगी।
बताए गए शुभ मुहूर्त के अनुसार, 20 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से दोपहर 3 बजकर 30 मिनट तक दुर्गा विसर्जन किया जा सकेगा। इस अवधि में श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार किसी भी समय देवी की प्रतिमा का विसर्जन कर सकते हैं। विसर्जन के दौरान भक्त मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की कामना करते हैं।
