व्यापारियों की प्रमुख मांग है कि कन्वर्जन फीस एकमुश्त और कुल पांच प्रतिशत तय की जाए। उनका कहना है कि निर्धारित फीस जमा करने के बाद उन्हें पूरा कमर्शियल एफएआर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही पुराने बाजारों को राहत देने और सीलिंग की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग भी उठाई गई है। व्यापारियों का मानना है कि व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े नियम स्पष्ट और व्यावहारिक होने चाहिए ताकि कारोबारियों को अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
व्यापारियों के बाद अब किसानों की आपत्तियां भी मास्टर प्लान के लिए अहम होने वाली हैं। भारतीय किसान संघ के बैनर तले किसान शाहपुरा स्थित टीएंडसीपी कार्यालय पहुंचकर अपनी चिंताएं अधिकारियों के सामने रखेंगे। इससे पहले गुरुवार को नीलबड़ में किसानों ने सड़क पर बैठकर प्रदर्शन किया था। किसानों का आरोप है कि नए ड्राफ्ट में 66 गांवों की कृषि भूमि को रिवरफ्रंट फॉरेस्ट ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल करने के प्रस्ताव से उनकी निजी जमीन खेती और आजीविका प्रभावित हो सकती है।
किसानों के मुताबिक वर्ष 1995 के मास्टर प्लान में संबंधित जमीनों का भू-उपयोग कृषि रखा गया था। वर्ष 2031 के लिए तैयार किए गए पहले के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में भी कृषि उपयोग का प्रावधान होने की बात कही जा रही है। अब नए ड्राफ्ट में बड़े तालाब के आसपास की कृषि भूमि के भू-उपयोग में बदलाव की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसान चाहते हैं कि जमीन का उपयोग बदलने से पहले उनकी आपत्तियों और अधिकारों पर गंभीरता से विचार किया जाए। भारतीय किसान संघ के तहसील अध्यक्ष अखिलेश मीणा ने भी किसानों की ओर से कार्यालय पहुंचकर विरोध दर्ज कराने की बात कही है।
मास्टर प्लान में बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र में निर्माण की सीमा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। किसानों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ इलाकों में आम लोगों के मकानों पर निर्माण संबंधी पाबंदियों की आशंका है जबकि एलडीआर में शामिल कुछ क्षेत्रों में निर्माण की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव है। आलोचकों का दावा है कि इससे प्रभावशाली लोगों के बंगलों और फार्म हाउस वाले इलाकों को फायदा मिल सकता है। हालांकि इन आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित नियमों निर्माण अनुमतियों और जमीन के रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।
किसानों ने मेंडोरा मेंडोरी सेवनिया गौंड और केरवा वुड्स जैसे क्षेत्रों में भू-उपयोग और जमीन की सरकारी गाइडलाइन में बदलाव पर भी चिंता जताई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मेंडोरी के केरवा वुड्स क्षेत्र में कृषि भूमि की कलेक्टर गाइडलाइन वर्ष 2025-26 में एक करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर थी जो वर्ष 2026-27 में बढ़कर तीन करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर हो गई। हालांकि सरकारी गाइडलाइन में बढ़ोतरी का अर्थ यह नहीं है कि वास्तविक बाजार मूल्य भी उसी अनुपात में बढ़ गया है।
किसानों की मांग है कि भोजताल संरक्षण जोन-1 और जोन-2 से जुड़े प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए और कृषि भूमि का उपयोग खेती के लिए सुरक्षित रखा जाए। उनका कहना है कि खेती ही उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है इसलिए जमीन के भविष्य से जुड़े फैसले लेते समय किसानों की सहमति और समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
टीएंडसीपी की संयुक्त संचालक इंदू त्रिपाठी के मुताबिक नियमानुसार 30 दिन के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए हैं। प्राप्त आपत्तियों को ऑनलाइन पोर्टल पर डिजिटाइज किया जाएगा और इसके बाद संबंधित पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया जाएगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि व्यापारियों और किसानों की मांगों पर सुनवाई के दौरान क्या निर्णय सामने आते हैं और भोपाल के विकास की प्रस्तावित योजना में किन बदलावों पर विचार किया जाता है।
