डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वैश्विक स्तर पर 21वीं सदी का समाज मानव सभ्यता के सबसे गहरे वैचारिक और सामाजिक संकटों में से एक से जूझ रहा है, जिसे हम ‘लैंगिक महायुद्ध’ (जेंडर वॉर) कह सकते हैं। इस विमर्श के केंद्र में दो ध्रुवीय विचारधाराएं खड़ी हैं। एक तरफ पश्चिम से आयातित, मार्क्सवादी द्वंद्व से प्रेरित ‘उग्र या विषैला फेमिनिज्म’ (टॉक्सिक/रैडिकल फेमिनिज्म) है, जो स्त्री और पुरुष के संबंधों को एक अंतहीन वर्ग-संघर्ष (क्लास स्ट्रगल) के रूप में देखता है। दूसरी तरफ, भारत की शाश्वत सनातन संस्कृति की ‘सह-अस्तित्ववादी स्त्री-दृष्टि’ है, जो जैविक और सामाजिक भिन्नताओं को शत्रुता का कारण नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन और पूरकता (कॉम्प्लिमेंटैरिटी) का आधार मानती है। विषैला फेमिनिज्म अधिकारों की अंधी, आक्रामक और एकाकी मांग पर आधारित है, जो परिवार और समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है। इसके विपरीत, सनातन दृष्टि कर्तव्य, धर्म और ‘अर्धनारीश्वर’ की आध्यात्मिक एकात्मता पर टिकी है। वर्तमान युग में लैंगिक समानता की आड़ में पुरुष-द्वेष (मिसैंड्री) और विखंडन को प्रगतिशीलता का पर्याय मान लिया गया है। अतः यह अनिवार्य हो जाता है कि हम दोनों दर्शनों का अकादमिक, शास्त्रीय, ऐतिहासिक और विधिक स्तर पर गहन व प्रामाणिक मूल्यांकन करें।
पाश्चात्य नारीवाद का दार्शनिक विकास और ‘विषैले फेमिनिज्म’ का उदय
पश्चिमी नारीवाद (वेस्टर्न फेमिनिज्म) की यात्रा मूलतः तीन और अब चार लहरों (वेव्स) में विभाजित है, जिसका विकासक्रम अधिकार की मांग से शुरू होकर समाज के पूर्ण विध्वंस तक जा पहुँचा। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में प्रथम लहर (फर्स्ट वेव) ने महिलाओं के लिए मताधिकार (सफ्रेज) और कानूनी समानता की न्यायसंगत मांग की। मैरी वोल्सटोनक्राफ्ट की पुस्तक ‘ए विन्डिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन’ (1792) ने इसके वैचारिक बीज बोए थे। लेकिन द्वितीय (सेकंड वेव) और तृतीय लहर (थर्ड वेव) के आते-आते यह विमर्श पूरी तरह मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में आ गया। फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपनी विख्यात कृति ‘द ओरिजिन ऑफ द फैमिली, प्राइवेट प्रॉपर्टी एंड द स्टेट’ (1884, इंटरनेशनल पब्लिशर्स, पृष्ठ क्रमांक 91) में स्थापना दी कि “वैवाहिक परिवार समाज की वह पहली आर्थिक इकाई है जहाँ पुरुष शासक/बुर्जुआ है और स्त्री शोषित/सर्वहारा है।” एंगेल्स के इसी आर्थिक द्वंद्व को लैंगिक द्वंद्व में बदलने का काम फ्रांसीसी अस्तित्ववादी दार्शनिक सिमोन द बोवुआर ने किया।
बोवुआर ने अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ (1949, विंटेज बुक्स, पृष्ठ क्रमांक 267) में लिखा: “स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है।” (वन इज़ नॉट बॉर्न, बट रादर बिकम्स अ वुमन)। इस एक वाक्य ने जैविक सत्य को सामाजिक षड्यंत्र घोषित कर दिया। इसके बाद 1970 के दशक में रेडिकल नारीवादियों, जैसे शुलामिथ फायरस्टोन ने अपनी पुस्तक ‘द डायलेक्टिक ऑफ सेक्स’ (1970, विलियम मोरो एंड कंपनी, पृष्ठ क्रमांक 74) में यह तर्क दिया कि जब तक ‘तैयार करने वाली जैविक मां’ की भूमिका से स्त्रियों को तकनीकी रूप से मुक्त नहीं किया जाता और पारंपरिक परिवार को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता, तब तक स्त्रियों की वास्तविक मुक्ति असंभव है। यही वह बिंदु है जहाँ से ‘विषैले फेमिनिज्म’ की शुरुआत होती है। यह विचारधारा मातृत्व को एक ‘बंधन’, विवाह को ‘गुलामी का पट्टा’ और पुरुष को ‘जन्मजात अत्याचारी और शोषक’ मानती है, जो आधुनिक समाज में पुरुष-विरोध और पारिवारिक विघटन का सबसे बड़ा कारण बन चुका है।
सनातन दर्शन का मूल अधिष्ठान: अर्धनारीश्वर और अद्वैत पूरकता
पश्चिमी दर्शन के विपरीत, जहाँ सृष्टि की उत्पत्ति एडम की पसली से ईव के जन्म जैसे एकाकी या अनुषंगी सिद्धांतों पर आधारित है, सनातन दर्शन सृष्टि के मूल में ही स्त्री और पुरुष की समान और समवर्ती उपस्थिति स्वीकार करता है। सनातन में ईश्वर को केवल ‘गॉड द फादर’ (गॉड द फादर) नहीं माना गया, बल्कि यहाँ ईश्वर का सर्वोच्च स्वरूप ‘सच्चिदानन्द’ है, जो प्रकृति और पुरुष का समन्वय है। बृहदारण्यक उपनिषद (अध्याय 1, ब्राह्मण 4, मंत्र 3, गीता प्रेस संस्करण, पृष्ठ क्रमांक 72) में सृष्टि की तात्विक उत्पत्ति का वर्णन करते हुए ऋषि कहते हैं: “स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम्। तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव।”
इस मंत्र की व्याख्या करते हुए आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि वह मूल चेतना एकाकीपन के कारण आनंदित नहीं थी। उसने स्वयं को दो समान भागों में विभाजित किया, जिससे एक भाग पति और दूसरा भाग पत्नी बना। ऋषि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसलिए यह पुरुष का अकेला शरीर वास्तव में आधे चने की दाल की तरह अधूरा है, जिसकी शून्यता या खाली आकाश केवल स्त्री के जुड़ाव से ही पूर्ण होता है। यहाँ कोई बड़ा या छोटा नहीं है; दोनों एक ही बीज के दो हिस्से हैं।
इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण (काण्ड 5, अध्याय 2, ब्राह्मण 1, श्लोक 10, अच्युत ग्रंथमाला संस्करण, पृष्ठ क्रमांक 1420) में स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है: “अर्धो ह वै एष आत्मनः यत्पत्नी, तस्माद् यत् जायां न विन्दते नैव तावत् प्रजायतेऽसर्वो हि तावद् भवति, अथ यदैव जायां विन्दतेऽथ प्रजायते तर्हि सर्वो भवति।” अर्थात् पत्नी वास्तव में पुरुष की आत्मा का आधा भाग (अर्धांगिनी) है। जब तक पुरुष पत्नी को प्राप्त नहीं करता, तब तक वह पूर्ण नहीं होता, वह अधूरा रहता है। जब वह स्त्री के साथ सह-अस्तित्व में आता है, तभी वह समग्रता को प्राप्त करता है। यह पूरकता का सिद्धांत पाश्चात्य नारीवाद के शोषक-शोषित द्वंद्व को जड़ से खारिज कर देता है।
वैदिक वांग्मय में स्त्री की संप्रभुता, स्वतंत्रता और ‘सम्राज्ञी’ का पद
सनातन वांग्मय में स्त्री को कभी भी पुरुष के अधीन या दोयम दर्जे की संपत्ति (प्रॉपर्टी) के रूप में नहीं देखा गया, जैसा कि मध्यकालीन पश्चिमी या अन्य संस्कृतियों में आम था (जहाँ लंबे समय तक महिलाओं में ‘आत्मा’ होने पर ही बहस होती रही)। ऋग्वेद के विवाह सूक्त (मण्डल 10, सूक्त 85, मंत्र 46, चौखम्बा संस्कृत सीरीज, पृष्ठ क्रमांक 924) में विवाह के समय वधू को जो सामाजिक और विधिक अधिकार दिए गए हैं, वे आज के तथाकथित सशक्तिकरण से कहीं अधिक ऊंचे हैं। वहाँ मंत्र कहता है: “सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्रूवां भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु॥” अर्थात् तुम अपने ससुराल में जाकर ससुर पर सम्राज्ञी बनो, सास पर सम्राज्ञी बनो, ननद और देवर पर भी तुम्हारी सम्राज्ञी (शासिका/क्वीन) की भूमिका हो। यहाँ ‘सम्राज्ञी’ शब्द का अर्थ गृह-प्रबंधन, गृह-नीति और संपूर्ण परिवार के नियंत्रण और नेतृत्व से है।
वैदिक काल में स्त्रियाँ केवल गृहस्थी तक सीमित नहीं थीं; वे ज्ञान और राष्ट्र की नियंता भी थीं। ऋग्वेद के 10वें मण्डल का 125वां सूक्त, जिसे ‘वाक् सूक्त’ या ‘देवी सूक्त’ (पृष्ठ क्रमांक 1042) कहा जाता है, उसकी द्रष्टा कोई पुरुष ऋषि नहीं, बल्कि महर्षि अम्भृण की विदुषी पुत्री ‘वाक्’ (ऋषिका वागाम्भृणी) हैं।
इस सूक्त में वह आत्मसाक्षात्कार की पराकाष्ठा पर पहुँचकर उद्घोष करती हैं: “अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।” अर्थात् मैं ही संपूर्ण राष्ट्र की स्वामिनी हूँ, वसुओं को एकत्र करने वाली हूँ, परम तत्व को जानने वाली तथा पूजनीयों में प्रथम हूँ। एक स्त्री द्वारा स्वयं को ब्रह्मांडीय चेतना और राष्ट्र की शक्ति के रूप में घोषित करना यह प्रमाणित करता है कि सनातन की स्त्री-दृष्टि कितनी संप्रभु और स्वतंत्र थी।
बौद्धिक और दार्शनिक संप्रभुता: गार्गी और उभय भारती के अकादमिक साक्ष्य
स्त्री की बौद्धिक श्रेष्ठता और शास्त्रार्थ (अकादमिक डिबेट्स) की स्वतंत्रता का सनातन इतिहास अकाट्य प्रमाणों से भरा पड़ा है। इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण बृहदारण्यक उपनिषद (अध्याय 3, ब्राह्मण 6, मंत्र 1, आनंद आश्रम संस्करण, पृष्ठ क्रमांक 345) में प्राप्त होता है, जहाँ राजा जनक की राजसभा में ब्रह्मविद्या पर सर्वोच्च शास्त्रार्थ चल रहा है। वहाँ विदुषी गार्गी वाचकनवी उठती हैं और उस काल के प्रकांड विद्वान और अपराजेय ऋषि याज्ञवल्क्य को सीधे चुनौती देती हैं। गार्गी पूछती हैं—”यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खलाप ओताश्च प्रोताश्चेति” (यह संपूर्ण संसार यदि जल में ओतप्रोत है, तो जल किसमें ओतप्रोत है?)। वह एक के बाद एक ब्रह्मांड की परतों पर प्रश्न पूछती हुई याज्ञवल्क्य को उस सीमा तक ले जाती हैं जहाँ ऋषि को कहना पड़ता है कि गार्गी, अब इससे आगे मत पूछो, अन्यथा तुम्हारा मस्तक गिर जाएगा। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि स्त्रियों को पुरुषों की विद्वता को चुनौती देने और राजसभाओं में गंभीर दार्शनिक विमर्श का नेतृत्व करने का पूर्ण अधिकार था।
इसी श्रृंखला में एक और युगांतकारी संदर्भ मध्यकाल के प्रारंभ का है, जिसका विवरण ‘माधवीय शंकर दिग्विजय’ (अध्याय 8, श्लोक 31-35, शारदा पीठ संस्करण, पृष्ठ क्रमांक 212) में मिलता है। जब आदि शंकराचार्य और कर्मकांड के प्रकांड पंडित मण्डन मिश्र के बीच ऐतिहासिक और निर्णायक शास्त्रार्थ हुआ, तो उस पूरे विमर्श का मध्यस्थ (जज/अंपायर) किसे बनाया गया? वह कोई पुरुष विद्वान नहीं, बल्कि मण्डन मिश्र की धर्मपत्नी विदुषी ‘उभय भारती’ (सरस्वती) थीं।
उन्होंने दोनों विद्वानों के गले में फूलों की माला डाली और घोषणा की कि जिसकी माला के फूल पहले कुम्हलाएंगे, वह पराजित माना जाएगा। जब मण्डन मिश्र हार गए, तब उभय भारती ने शंकराचार्य से कहा कि “आपने अभी केवल मेरे पति को जीता है, जो कि मेरी आधी आत्मा हैं। शास्त्रार्थ के नियमों के अनुसार जब तक आप मुझे पराजित नहीं करते, आपकी विजय पूर्ण नहीं मानी जाएगी।” इसके बाद उन्होंने स्वयं शंकराचार्य से कड़ा शास्त्रार्थ किया। यह घटना दर्शाती है कि सनातन समाज में स्त्रियों की मेधा (इंटेलेक्ट) और उनका निर्णय पुरुषों के लिए भी सर्वोपरि और बाध्यकारी था।
नैतिक एवं सामाजिक संरक्षण: मनुस्मृति और महाभारत के विवादों का यथार्थ
आधुनिक विषैले फेमिनिज्म द्वारा सनातन संस्कृति पर प्रहार करने के लिए अक्सर मनुस्मृति (अध्याय 5, श्लोक 148) के एक अंश को उद्धृत किया जाता है: “न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति”। इसके आधार पर यह दुष्प्रचार किया जाता है कि मनु स्त्रियों को गुलाम बनाए रखने के पक्षधर थे। परंतु यदि हम इसी ग्रंथ की न्यायशास्त्रीय पद्धति और संदर्भ को देखें, तो सच कुछ और ही सामने आता है।
मनुस्मृति के उसी अध्याय के श्लोकों की व्याख्या करते हुए प्रख्यात न्यायविद डॉ. पी. वी. काणे अपनी कालजयी कृति ‘हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र’ (वॉल्यूम II, भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पृष्ठ क्रमांक 421) में लिखते हैं कि यहाँ ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ ‘अधिकारों से वंचित करना’ नहीं, बल्कि ‘सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण’ (प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी) का दायित्व है। मनु का आशय था कि स्त्री समाज की इतनी मूल्यवान और केंद्रीय धरोहर है कि उसे जीवन के किसी भी पड़ाव पर (बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा) असुरक्षित या अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
मनु उसी मनुस्मृति (अध्याय 3, श्लोक 56, पृष्ठ क्रमांक 112) में स्पष्ट आदेश देते हैं: “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥” अर्थात् जहाँ नारियों का आदर-सत्कार होता है, वहाँ देवता (दिव्य गुण और सुख-समृद्धि) निवास करते हैं, और जहाँ इनका आदर नहीं होता, वहाँ किए गए सारे बड़े से बड़े कार्य और धार्मिक अनुष्ठान भी निष्फल हो जाते हैं।
इसी चेतना का विस्तार हमें महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 46, श्लोक 5-7, गीता प्रेस संस्करण, पृष्ठ क्रमांक 5612) में मिलता है, जहाँ पितामह भीष्म राजधर्म का उपदेश देते हुए कहते हैं: “जामयः यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः। तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः॥” अर्थात् जिन घरों में स्त्रियाँ अनादृत होकर, दुखी मन से शाप देती हैं या रोती हैं, वे घर किसी अभिचार कर्म (काले जादू) से मारे गए घरों की तरह वैभव, धन और पशुओं सहित पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। सनातन की दृष्टि अधिकार की लड़ाई की नहीं, बल्कि स्त्री के प्रति गहरे नैतिक उत्तरदायित्व की थी।
मध्यकाल का संक्रमण: बाह्य आक्रमण और मूल सनातन दृष्टि का ह्रास
यहाँ यह गंभीर ऐतिहासिक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि सनातन की स्त्री-दृष्टि इतनी महान, प्रगतिशील और सह-अस्तित्ववादी थी, तो कालांतर में भारतीय समाज में पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह और कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ और विकृतियाँ कैसे उत्पन्न हुईं? इस विषय पर प्रसिद्ध इतिहासकार आर. सी. मजूमदार अपनी पुस्तक ‘द हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपल’ (वॉल्यूम VI: द दिल्ली सल्तनत, भारतीय विद्या भवन, पृष्ठ क्रमांक 624-626) में सविस्तार विश्लेषण करते हैं। मजूमदार लिखते हैं कि 11वीं से 16वीं शताब्दी के बीच भारत पर हुए निरंतर विदेशी और इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमणों ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह रक्षात्मक (डिफेंसिव मोड) होने पर मजबूर कर दिया।
विदेशी शासकों द्वारा महिलाओं के अपहरण, उनके जबरन धर्म परिवर्तन और दास-बाजारों में उनकी बिक्री जैसी विभीषिकाओं से अपनी बेटियों और बहुओं की अस्मत की रक्षा करने के लिए समाज ने कठोर और संकीर्ण नियम बनाना शुरू कर दिया। लड़कियों को बाहरी दुनिया से छुपाने के लिए ‘पर्दा प्रथा’ शुरू हुई, उनकी कम उम्र में शादी करके जिम्मेदारी सौंपने के लिए ‘बाल विवाह’ को बढ़ावा मिला, और युद्ध में पतियों की मृत्यु के बाद जौहर या ‘सती प्रथा’ जैसी आत्मघाती परंपराएं सुरक्षात्मक आवरण के रूप में समाज में पैठ बना गईं। इन कुरीतियों का मूल सनातन दर्शन या वेदों से कोई संबंध नहीं था; ये केवल एक अत्यंत कठिन और हिंसक कालखंड में जीवित रहने की रणनीतियाँ थीं। परंतु आधुनिक विषैला फेमिनिज्म इन मध्यकालीन विकृतियों को ही ‘मूल सनातन धर्म’ मानकर पूरे हिंदू समाज और संस्कृति पर विषवमन करता है, जो कि पूरी तरह से ऐतिहासिक झूठ है।
आधुनिक भारत में विषैले फेमिनिज्म का कानूनी तांडव और विधिक तथ्य
आधुनिक समय में पश्चिमी रेडिकल फेमिनिज्म के प्रभाव में आकर भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए जो कानून बनाए गए थे, उनका एक बड़ा हिस्सा अब पुरुषों के उत्पीड़न और समाज में अविश्वास पैदा करने का माध्यम बन गया है। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार इस विसंगति पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। इसका सबसे बड़ा न्यायिक साक्ष्य ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ (2014) [8 एससीसी 273, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रति, पृष्ठ क्रमांक 278] का ऐतिहासिक मामला है। इस मामले में फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद ने देश के वैधानिक इतिहास में पहली बार एक अत्यंत कड़ा शब्द प्रयोग किया।
उन्होंने कहा, “द फैक्ट दैट सेक्शन 498ए ऑफ द आईपीसी इज़ अ कॉग्निजेबल एंड नॉन-बेलेबल ऑफेन्स हैज़ लेंट इट अ डिस्ग्रंटल्ड वाइफ टू यूज़ इट ऐज़ अ वेपन रादर दैन शील्ड। इट हैज़ लेड टू व्हाट कैन बी टर्म्ड ऐज़ ‘ज्यूडिशियल टेररिज्म’ (न्यायिक आतंकवाद)…”
न्यायालय ने माना कि दहेज विरोधी कानून का इस्तेमाल पत्नियां अपने पतियों के बूढ़े माता-पिता, अविवाहित बहनों और यहाँ तक कि दूर के रिश्तेदारों को बिना किसी प्राथमिक जांच के जेल भेजने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए कर रही हैं। इसी प्रकार, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी, ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट 2024) के सांख्यिकीय आंकड़े बताते हैं कि धारा 498ए के तहत दर्ज मामलों में दोषसिद्धि की दर (कन्विक्शन रेट) मात्र 15 फीसद से 20 प्रतिशत के बीच रहती है, जो यह दर्शाता है कि अस्सी प्रतिशत मामले या तो आपसी रंजिश के कारण बढ़ा-चढ़ाकर लिखे जाते हैं या पूरी तरह झूठे होते हैं।
इसके अतिरिक्त, हाल के वर्षों में आपसी सहमति से बने संबंधों (लिव-इन रिलेशनशिप्स) के टूटने या शादी का वादा टूटने पर दर्ज कराए जाने वाले ‘झूठे बलात्कार’ (फॉल्स रेप केसेज) के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘संजय मलिक बनाम राज्य’ (2022) के मामले में टिप्पणी की थी कि महिलाएं कानून का उपयोग अपनी वित्तीय या व्यक्तिगत मांगें पूरी करने के लिए एक ‘हथियार’ के रूप में कर रही हैं। इस विकृति ने समाज में स्त्री और पुरुष के बीच परस्पर विश्वास, प्रेम और सम्मान की नींव को पूरी तरह हिला कर रख दिया है।
वैचारिक तुलनात्मक ढांचा: पूरकता बनाम लैंगिक महायुद्ध
भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान शिक्षाविद और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिलिजन एंड सोसाइटी’ (1947, जॉर्ज एलेन एंड अनविन पब्लिशर्स, लंदन, पृष्ठ क्रमांक 98) में पाश्चात्य नारीवाद की मूल बीमारी को रेखांकित करते हुए लिखा था, “द वेस्टर्न टाइप ऑफ फेमिनिज्म इज़ एन अटेम्प्ट टू मेक वुमन अ कॉपी ऑफ मैन। इट फेल्स टू रिकग्नाइज द डिस्टिंक्ट स्पिरिचुअल एंड सोशल वैल्यू ऑफ द फेमिनिन नेचर। ट्रू डेवलपमेंट लाइज़ इन कॉम्प्लिमेंटैरिटी, नॉट इन मैकेनिकल इमिटेशन।” (पश्चिमी नारीवाद स्त्री को पुरुष की एक नकल बनाने का प्रयास है। यह स्त्री स्वभाव के विशिष्ट आध्यात्मिक और सामाजिक मूल्य को पहचानने में विफल रहता है। वास्तविक विकास पूरकता में है, यांत्रिक नकल में नहीं)।
इस वैचारिक अंतर को हम निम्नलिखित विस्तृत तुलनात्मक तालिका के माध्यम से पूरी स्पष्टता से समझ सकते हैं:-
विमर्श के आयाम सनातन की सह-अस्तित्ववादी स्त्री-दृष्टि विषैला/उग्र फेमिनिज्म (रेडिकल फेमिनिज्म)
दार्शनिक मूल अद्वैत, एकात्मता और शिव-शक्ति (अर्धनारीश्वर) का समन्वय। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष सिद्धांत।
संबंधों का स्वरूप परस्पर पूरकता (कॉम्प्लिमेंटैरिटी); एक-दूसरे के बिना अधूरे। प्रतिस्पर्धा, निरंतर टकराव और जन्मजात पुरुष-द्वेष (मिसैंड्री)।
सामाजिक धुरी कर्तव्य-केंद्रित (ड्यूटी-सेंट्रिक) व्यवस्था; धर्म और परिवार सर्वोपरि। केवल अधिकार-केंद्रित (राइट-सेंट्रिक) व्यक्तिवाद; समाज गौण।
वैवाहिक संस्था आत्माओं का पवित्र, अटूट आध्यात्मिक संस्कार और समाज की नींव। पितृसत्तात्मक उत्पीड़न, गुलामी और आर्थिक शोषण का केंद्र।
मातृत्व की अवधारणा सृष्टि का सर्वोच्च सृजनात्मक गौरव, शक्ति और ईश्वरत्व का रूप। स्त्री के करियर और विकास की राह में एक ‘बाधा’ या ‘बंधन’।
स्वतंत्रता का अर्थ आत्म-नियंत्रण, गरिमा और मर्यादा के साथ आत्मिक उन्नति। उच्छृंखलता, उपभोक्तावाद और नैतिक बंधनों का पूर्ण निषेध।
अंतिम सामाजिक लक्ष्य समाज, परिवार और दोनों लिंगों के बीच संतुलन, शांति व धर्म की स्थापना। पारंपरिक सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक ढांचे का पूर्ण विध्वंस।
मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक दुष्प्रभाव: एकाकीपन और बिखरता समाज
विषैले फेमिनिज्म का सबसे घातक प्रभाव स्वयं महिलाओं और समाज के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जब आप समाज की सबसे छोटी और सबसे सुरक्षित इकाई यानी ‘परिवार’ को ही एक युद्धक्षेत्र बना देते हैं, तो उसका परिणाम केवल विनाश होता है। समाजशास्त्री डॉ. एम. एन. श्रीनिवास अपनी पुस्तक ‘सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया’ (ओरिएंट ब्लैकस्वान, पृष्ठ क्रमांक 174) में लिखते हैं कि पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ में जब पारिवारिक मूल्य टूटते हैं, तो उसका पहला शिकार बच्चे और वृद्ध होते हैं।
आज महानगरों में बढ़ती तलाक की दरें, अदालतों में सालों-साल चलने वाले भरण-पोषण और बच्चों की कस्टडी के क्रूर मुकदमे, और लिव-इन रिलेशनशिप की अस्थिरता ने युवाओं में भयंकर अवसाद (डिप्रेशन) और अकेलेपन (लोनलीनेस) को जन्म दिया है। विषैला फेमिनिज्म स्त्री को ‘सशक्त’ करने के नाम पर उसे एक ऐसे अंतहीन संघर्ष में झोंक देता है जहाँ वह प्रकृति के नियमों और अपनी भावनाओं के विरुद्ध चौबीसों घंटे युद्ध की मुद्रा में रहती है। पुरुषों में यह डर घर कर गया है कि किसी भी छोटे विवाद में उनका पूरा करियर और सम्मान एक झूठे आरोप से नष्ट हो सकता है, जिसके कारण वे महिलाओं की सामान्य संकट में भी मदद करने से कतराने लगे हैं। यह सामाजिक ताने-बाने का पूर्ण विखंडन है।
अर्धनारीश्वर चेतना का पुनरुत्थान
समग्र विवेचन के प्रकाश में यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि ‘विषैला फेमिनिज्म’ लैंगिक न्याय या समानता लाने का कोई समाधान नहीं है, बल्कि यह स्वयं में एक नई सामाजिक बीमारी है। यह विचारधारा घृणा पर टिकी है, और घृणा से कभी भी एक स्वस्थ, सुंदर और सुरक्षित समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता। इस आधुनिक लैंगिक महायुद्ध (जेंडर वॉर) का एकमात्र, शाश्वत और व्यावहारिक समाधान केवल और केवल सनातन की ‘सह-अस्तित्ववादी स्त्री-दृष्टि’ और ‘अर्धनारीश्वर चेतना’ में समाहित है।
सृष्टि का चक्र स्त्री और पुरुष दोनों के पहियों से चलता है। दोनों में से कोई भी न तो श्रेष्ठ है और न ही हीन; दोनों विशिष्ट हैं, दोनों अनिवार्य हैं। स्त्री की वास्तविक मुक्ति या सशक्तिकरण पुरुष के विरोध में खड़े होने में, उसकी नकल करने में या पारिवारिक संस्था को तोड़ने में नहीं है, बल्कि अपनी नैसर्गिक शक्ति, ममता, मेधा और गरिमा को पहचानते हुए समाज में अपना सर्वोच्च स्थान पुनः प्राप्त करने में है। समाज को भी चाहिए कि वह मध्यकालीन विकृतियों को पूरी तरह त्याग कर वेदों और उपनिषदों की उस मूल एकात्म चेतना की ओर लौटे, जहाँ स्त्री अर्धांगिनी भी है, सम्राज्ञी भी है और साक्षात शक्ति भी। जब पुरुष में शिव का विवेक और स्त्री में शक्ति का सामर्थ्य परस्पर सह-अस्तित्व के भाव से मिलेंगे, तभी एक न्यायपूर्ण, शांतिमय और प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण संभव हो सकेगा।
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संदर्भ ग्रंथ सूची :-
1. बृहदारण्यक उपनिषद (शांकरभाष्य सहित), गीता प्रेस, गोरखपुर।
2. शतपथ ब्राह्मण, अच्युत ग्रंथमाला, वाराणसी।
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8. राधाकृष्णन, एस. (1947)। रिलिजन एंड सोसाइटी। जॉर्ज एलेन एंड अनविन, लंदन।
9. सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया: अर्नेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार (2014) 8 एससीसी 273।
10. मजूमदार, आर. सी. (संपादक)। द हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपल (वॉल्यूम VI)। भारतीय विद्या भवन, मुंबई।
