इस परिवर्तन की वैचारिक नींव Swami Dayanand Saraswati ने रखी थी। उन्होंने अपने ग्रंथ Satyarth Prakash में स्पष्ट रूप से बताया कि स्वतंत्रता सर्वोच्च है और परतंत्रता अभिशाप। उनके विचारों ने न केवल भारत में बल्कि मॉरीशस जैसे दूरस्थ द्वीपों पर बसे भारतीयों के मन में भी स्वाधीनता और स्वाभिमान की भावना जगाई।
बीसवीं सदी की शुरुआत में जब मॉरीशस में Satyarth Prakash पहुंचा, तब वहां के समाज में बड़ा बदलाव शुरू हुआ। सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास और जात-पात की बाधाओं को चुनौती मिली। धीरे-धीरे आर्यसमाज के प्रयासों से शिक्षा का प्रसार हुआ और लोगों में संगठन की भावना विकसित हुई। गांव-गांव में स्कूलों और शाखाओं की स्थापना कर लोगों को साक्षर बनाया गया, जिससे उनमें राजनीतिक समझ भी विकसित हुई।
आर्यसमाज ने केवल धार्मिक सुधार ही नहीं किए, बल्कि लोगों को उनके अधिकारों के प्रति भी जागरूक किया। इसका सबसे बड़ा असर 1948 के चुनावों में देखने को मिला, जब मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई। जहां पहले केवल कुछ हजार लोग ही मतदान कर पाते थे, वहीं शिक्षा और जागरूकता के कारण यह संख्या कई गुना बढ़ गई। इससे मॉरीशस की राजनीति में भारतीय मूल के लोगों की भागीदारी मजबूत हुई और स्वतंत्रता आंदोलन को गति मिली।
1948 से 1967 तक चले स्वतंत्रता संग्राम में आर्यसमाजियों ने सक्रिय भूमिका निभाई और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत समर्थन दिया। इस तरह सामाजिक सुधार से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक स्वतंत्रता की दिशा में बदल गया और अंततः मॉरीशस को आजादी की राह पर आगे बढ़ाया।
आज भी मॉरीशस और भारत के बीच सांस्कृतिक संबंधों की मजबूती में आर्यसमाज की यह विरासत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह इतिहास इस बात का प्रमाण है कि किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक संघर्ष से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, शिक्षा और एकजुटता से हासिल होती है।
