डॉ. मयंक चतुर्वेदी
उत्तराखंड भारतीय आत्मचेतना का वह उन्नत शिखर है जहां सांसारिकता क्षीण होती है और आध्यात्मिकता प्रबल! यह वही भूमि है जहां गंगा अवतरित होती हैं, जहां केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे धाम सनातन चेतना के जीवंत केंद्र हैं। ऐसे में जब पुष्कर सिंह धामी की सरकार इस पवित्र धरा को “ऑल-सीजन टूरिज्म डेस्टिनेशन” के रूप में स्थापित करने की बात करती है, तब अवश्य यह प्रश्न बार-बार उठना है कि क्या उत्तराखंड की आध्यात्मिक गरिमा को बाजार के तराजू पर तौला जा रहा है?
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के संदर्भ में मुख्यमंत्री धामी ने जिस प्रकार पर्यटन के आंकड़े प्रस्तुत किए, जिसमें कि बताया गया कि डेढ़ लाख से अधिक पर्यटक, आदि कैलाश में 36,700 आगंतुक, निश्चित ही ये सराहनीय है और प्रशासनिक दृष्टि से उपलब्धि हो सकती है, परंतु सनातन दृष्टि से यह चिंता का विषय भी है। क्योंकि उत्तराखंड “पर्यटन स्थल” नहीं है, यह पुण्य-पवित्र “तीर्थ” है। तीर्थ का अर्थ ही है सिर्फ यात्रा स्थल नहीं होना, इससे कहीं अधिक भाव धारा के स्तर पर आत्मशुद्धि और मोक्ष की साधना का केंद्र होने में है।
तीर्थ और पर्यटन के बीच के मूलभूत अंतर को समझना जरूरी है
वास्तव में आज तीर्थ और पर्यटन के बीच का अंतर समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है। पर्यटन उपभोग की मानसिकता पर आधारित होता है, जिसमें देखना, घूमना, आनंद लेना ही सबकुछ है। इसके विपरीत, तीर्थ तपस्या, संयम और आत्मानुशासन का मार्ग है। जब कोई व्यक्ति केदारनाथ जाता है, तो वह पहाड़ देखने नहीं जाता, अपने भीतर के अहंकार को त्यागने, ईश्वर से जुड़ने और आत्मा की शांति पाने के लिए जाता है। लेकिन वर्तमान नीतियां इस अंतर को धुंधला कर रही हैं।
बेशक! सड़क, होटल, डिजिटल सुविधाएं ये सब आवश्यक हो सकते हैं, परंतु जब इनका उद्देश्य अधिक से अधिक पर्यटक लाना बन जाए, तब निश्चित ही यह तीर्थ की पवित्रता पर आघात करता है। क्या हमने कभी सोचा है कि अत्यधिक भीड़, प्रदूषण और व्यावसायीकरण से इन पवित्र स्थलों की आध्यात्मिक ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
इसका अर्थ ये नहीं समझा जाए कि यहां हो रहे भौतिक विकास का विरोध किया जा रहा है, ये सच है कि उत्तराखंड में आधारभूत सुविधाओं का विकास आवश्यक है। स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी जरूरी हैं। परंतु विकास का यह मॉडल सिर्फ पर्यटन-केन्द्रित होगा, तब अवश्य ही यह दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। क्योंकि उत्तराखंड पहले ही कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है; केदारनाथ त्रासदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ऐसे में अनियंत्रित निर्माण, अत्यधिक पर्यटक दबाव और पर्यावरण की अनदेखी भविष्य में और बड़े संकट को जन्म दे सकती है।
धामी सरकार को यह समझना होगा कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी पूंजी उसकी प्रकृति और आध्यात्मिकता है। यदि इन्हीं का क्षरण हो गया, तो पर्यटन भी टिकाऊ नहीं रहेगा। इसलिए यदि इस सरकार को जोर ही देना है तो पर्यटन के नाम पर क्यों देना चाहिए, प्रकृति और आध्यात्मिकता के आधार को क्यों नहीं वह सबसे आगे लेकर चल रही है?
यह तो सनातन परंपरा का अपमान है
सनातन धर्म में हिमालय को “देवात्मा” कहा गया है, देवताओं का निवास। उत्तराखंड उसी हिमालय की गोद में बसा है। यहां के हर कण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार है। ऐसे में जब इस भूमि को केवल “टूरिस्ट स्पॉट” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो यह सनातन परंपरा के मूल भाव का अपमान है। क्या हम काशी, अयोध्या या रामेश्वरम को सिर्फ पर्यटन स्थल कह सकते हैं? नहीं। क्योंकि वे हमारी आस्था के केंद्र हैं। उसी प्रकार उत्तराखंड भी घूमने की जगह नहीं है, बल्कि यह पूरा क्षेत्र ही साधना का पवित्र स्थल और कर्मक्षेत्र है।
‘मन की बात’ और वास्तविकता
प्रधानमंत्री जी का ‘मन की बात’ एक प्रेरणादायी कार्यक्रम है, जैसा कि मुख्यमंत्री ने कहा, इसमें कोई संदेह भी नहीं कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार उत्तराखंड की प्रशंसा की है। किंतु सवाल यह है कि क्या इस प्रशंसा का उपयोग पर्यटन बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए या फिर इसे उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत को संरक्षित करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए?
यदि प्रधानमंत्री स्वयं उत्तराखंड के आध्यात्मिक महत्व को समझते हैं, तब राज्य सरकार का दायित्व और बढ़ जाता है कि वह इस विरासत को व्यावसायिकता से बचाए। सरकार का तर्क है कि पर्यटन से स्थानीय लोगों की आय बढ़ेगी, रोजगार मिलेगा। यह आंशिक रूप से सही भले ही हो, पर यह भी सच है कि अनियंत्रित पर्यटन स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली को भी प्रभावित करता है। होमस्टे योजना, ग्रामीण पर्यटन, ये सब अच्छे प्रयास हो सकते हैं, लेकिन इनका संचालन इस प्रकार होना चाहिए कि स्थानीय परंपराएं सुरक्षित रहें, न कि वे केवल “पर्यटकों को आकर्षित करने का साधन” बनकर रह जाएं।
ऐसे में आज धामी सरकार ने यही कहना है कि वह अपने राज्य के लिए “तीर्थ-पर्यटन” की अवधारणा पर काम करे, जिसमें आध्यात्मिक अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए।तीर्थ यात्रा को “अनुष्ठान” के रूप में प्रस्तुत किया जाए, ताकि जो भी अतिथि उत्तराखण्ड पहुंचे वह संपूर्णता के साथ आध्यात्किक अनुभव लेकर उन्हें अपनी गहरी स्मृतियों में संजोकर वापिस लौटे।
अत: यहां कहना यही है कि उत्तराखंड को आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से देखना एक गंभीर भूल होगी। यह भूमि सनातन धर्म की आत्मा है, और इसकी पवित्रता को बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। पुष्कर सिंह धामी को यह समझना होगा कि विकास का अर्थ अधिक पर्यटक लाना नहीं हो सकता है, अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखना भी है। यदि उत्तराखंड की पहचान ही बदल गई, तो समझलीजिए कि यह संपूर्ण भारत के लिए एक अपूरणीय क्षति होगी। उत्तराखंड को “टूरिज्म डेस्टिनेशन” नहीं बनाना है, यह “मोक्ष का द्वार” बना रहे, हमें यही कामना करनी चाहिए, सिर्फ इसी की ही आवश्यकता है।
