हे राम अभी तो कलयुग प्रारंभ ही हुआ है—-
कुछ खबरें पढ़ी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं। वे आंखों से नहीं, सीधे हृदय पर दस्तक देती हैं। हरियाणा के सोनीपत से आई एक ऐसी ही खबर ने पूरे समाज के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका उत्तर केवल कानून या तर्क नहीं, बल्कि हमारी अंतरात्मा ही दे सकती है।
74 वर्षीय शिवचरण रामरत्न गुप्ता… एक पिता, जिसने अपना जीवन संघर्ष में बिताया। कपड़े का व्यापार किया, परिवार को संभाला, अपनी बेटियों को पढ़ाया-लिखाया, उन्हें इस योग्य बनाया कि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। हर पिता की तरह उन्होंने भी अपने हिस्से की इच्छाएं त्यागकर संतान के सपनों को अपना सपना बनाया होगा। शायद उन्होंने भी कभी सोचा होगा कि बुढ़ापे में जब कदम लड़खड़ाएंगे, तो उन्हीं हाथों का सहारा मिलेगा जिन्हें उन्होंने चलना सिखाया था।
लेकिन नियति ने नहीं, बल्कि बदलते समाज ने उनके साथ सबसे बड़ा मजाक किया।
जीवन की अंतिम घड़ियों में वे एक वृद्धाश्रम के कमरे में थे। आश्रम ने लगभग बीस दिन पहले बेटियों को सूचना दी कि पिता की तबीयत गंभीर है। शायद हर गुजरते दिन उनकी आंखें दरवाजे पर टिकती होंगी। शायद हर आहट पर उन्हें लगता होगा—”मेरी बेटियां आ गईं…”
लेकिन वह इंतजार कभी खत्म नहीं हुआ।
मृत्यु आ गई, पर बेटियां नहीं आईं।
उन्होंने अंतिम संस्कार के लिए ₹5,100 भेज दिए। वीडियो कॉल पर अंतिम दर्शन कर लिए। और फिर एक पिता की चिता को आग देने का दायित्व उन लोगों ने निभाया, जिनसे उनका रक्त का नहीं, केवल मानवता का रिश्ता था।
यह घटना केवल तीन बेटियों की कहानी नहीं है। यह उस समाज की कहानी है, जहां घर बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन रिश्ते छोटे। जहां मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, लेकिन संवेदनाएं धुंधली पड़ रही हैं। जहां हर सुविधा उपलब्ध है, पर अपने ही माता-पिता के लिए समय नहीं।
आज हम बच्चों को उच्च शिक्षा दे रहे हैं, दुनिया जीतने का साहस दे रहे हैं, लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखा रहे हैं कि माता-पिता का हाथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए? यदि सफलता की कीमत अपने जन्मदाताओं का अकेलापन है, तो ऐसी सफलता पर गर्व नहीं, चिंता होनी चाहिए।
यह भी सच है कि हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं। कई बार दूरियां मजबूरी से भी बनती हैं, और किसी एक घटना के आधार पर सभी बेटों-बेटियों या पूरे समाज का आकलन करना उचित नहीं होगा। लेकिन जब ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो वे हमें यह सोचने के लिए अवश्य विवश करती हैं कि कहीं हमारे सामाजिक मूल्य और पारिवारिक संबंध कमजोर तो नहीं पड़ रहे।
वृद्धाश्रमों में रहने वाले सभी बुजुर्ग उपेक्षित नहीं होते, लेकिन यह भी कटु सत्य है कि अनेक वृद्ध आज अपने ही परिवार से भावनात्मक दूरी का दर्द झेल रहे हैं। उन्हें सबसे अधिक जरूरत दवाइयों की नहीं, अपनापन देने वाले दो शब्दों की होती है। वे धन नहीं मांगते, समय मांगते हैं। वे महंगे उपहार नहीं चाहते, बस इतना चाहते हैं कि कोई उनका हाल पूछ ले।
विडंबना देखिए—जिस पिता ने बचपन में बच्चों के रोने पर रातें जागकर काटीं, उसी पिता की अंतिम यात्रा में उसके अपने कदमों की आहट तक नहीं पहुंची। जो व्यक्ति कभी परिवार का आधार था, उसकी विदाई में परिवार अनुपस्थित रहा।
मेरे विचार किसी को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने के लिए है। क्योंकि यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाले वर्षों में ऐसे समाचार अपवाद नहीं, सामान्य बन जाएंगे।
हमें यह याद रखना होगा कि माता-पिता केवल हमारे अतीत का हिस्सा नहीं होते, वे हमारे अस्तित्व की जड़ हैं। जड़ें सूख जाएं, तो शाखाएं कितनी भी ऊंची क्यों न हो जाएं, उनका भविष्य सुरक्षित नहीं रहता।
आइए, अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय अपने माता-पिता के लिए निकालें। उनके साथ बैठें, उनकी बातें सुनें, उनका हाथ थामें। क्योंकि एक दिन ऐसा भी आएगा जब वे नहीं होंगे, और तब दुनिया की कोई दौलत, कोई उपलब्धि और कोई वीडियो कॉल उस एक अधूरे आलिंगन की भरपाई नहीं कर सकेगी।
किसी पिता के जीवन का सबसे बड़ा सम्मान उसकी संतान की सफलता नहीं, बल्कि उसके अंतिम समय में अपनेपन का स्पर्श होता है। और शायद यही वह संस्कार है, जिसे बचाए रखना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है।
