शिवपुरी। जिले में आंगनवाड़ी केंद्रों की बदहाल व्यवस्था पर आखिरकार प्रशासन की नींद टूटी है। खनियांधाना क्षेत्र में दो आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं, 20 से अधिक कार्यकर्ता और सहायिकाओं को नोटिस थमा दिए गए हैं, मानदेय काटा गया है और कुछ को अंतिम चेतावनी दी गई है। कार्रवाई कलेक्टर अर्पित वर्मा के निर्देश पर हुई है।
लेकिन इस कार्रवाई से बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जिन केंद्रों पर लंबे समय से बच्चे, गर्भवती महिलाएं और हितग्राही योजनाओं से वंचित रहे, वहां जिम्मेदार केवल आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं या पूरा विभाग?
निरीक्षण में सामने आया कि कई केंद्र नियमित नहीं खुल रहे थे, पोषण ट्रैकर एप अपडेट नहीं था, कुपोषित बच्चों का प्रबंधन प्रभावित था, रिकॉर्ड अधूरे थे और योजनाओं का लाभ लाभार्थियों तक नहीं पहुंच रहा था। यदि हालात इतने खराब थे, तो विभागीय पर्यवेक्षक, परियोजना अधिकारी और वरिष्ठ अधिकारी अब तक क्या देख रहे थे?
जब केंद्र बंद थे, तब निरीक्षण रिपोर्टों में सब ठीक कैसे था?
आंगनवाड़ी केंद्र एक-दो दिन नहीं, बल्कि लंबे समय से प्रभावित बताए जा रहे हैं। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि पहले होने वाले निरीक्षणों में सब कुछ संतोषजनक कैसे मिलता रहा? क्या रिपोर्टें केवल कागजों में बनती रहीं?
अगर महीनों तक केंद्र नहीं खुले, पोषण योजनाएं प्रभावित रहीं और बच्चों का रिकॉर्ड अधूरा रहा, तो जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर डालकर क्या विभाग अपनी जवाबदेही से बच सकता है?
सबसे बड़ा नुकसान किसका हुआ?
कार्रवाई से पहले जिन बच्चों को पोषण मिलना था, जिन गर्भवती महिलाओं को सेवाएं मिलनी थीं और जिन परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना था—उनका नुकसान कौन भरेगा?
कुपोषण से जूझ रहे क्षेत्रों में आंगनवाड़ी केंद्रों की लापरवाही सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सामाजिक नुकसान मानी जाती है।
अब सवाल कार्रवाई का नहीं, जवाबदेही का है
दो कार्यकर्ताओं की सेवा समाप्त करना और नोटिस जारी करना आसान कदम है। असली जवाबदेही तब होगी जब यह भी तय हो कि महीनों तक बिगड़ी व्यवस्था पर नजर रखने वाले अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई या होगी।
क्योंकि व्यवस्था में नीचे बैठे कर्मचारी अकेले दोषी नहीं हो सकते, जब ऊपर बैठी निगरानी मशीनरी समय पर जागी ही नहीं।
