शिवपुरी। हालिया बस दुर्घटना के बाद जिला प्रशासन अचानक सुरक्षा मानकों को लेकर सक्रिय नजर आ रहा है। कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट अर्पित वर्मा ने बस संचालकों की बैठक लेकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि बिना आपातकालीन खिड़की, अग्निशमन यंत्र और जरूरी सुरक्षा उपकरणों के बसों का संचालन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। नियमों के उल्लंघन पर बस जब्ती और कठोर कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
बैठक में बसों में फर्स्ट एड बॉक्स, कार्यशील अग्निशामक यंत्र, इमरजेंसी एग्जिट, फिटनेस प्रमाण पत्र, बीमा, परमिट, प्रदूषण प्रमाण पत्र, नियमित तकनीकी जांच और यात्रियों की निर्धारित संख्या जैसे नियमों का पालन अनिवार्य बताया गया। स्लीपर बसों के लिए भी अतिरिक्त सुरक्षा निर्देश जारी किए गए हैं।
लेकिन इन निर्देशों के साथ सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या ये सारे नियम आज बने हैं या पहले से लागू थे?
हादसे के बाद ही क्यों याद आते हैं सुरक्षा मानक?
बसों में अग्निशमन यंत्र, फिटनेस, इमरजेंसी एग्जिट और वैध दस्तावेज कोई नई शर्त नहीं हैं। ये वर्षों से परिवहन नियमों का हिस्सा हैं। फिर जिले में चल रही बसों की नियमित जांच के बावजूद यदि अब दोबारा इन निर्देशों की जरूरत पड़ रही है, तो इसका मतलब क्या पहले निगरानी कमजोर थी?
यदि कई बसें बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों के चल रही थीं, तो जिम्मेदारी केवल बस संचालकों की है या परिवहन विभाग की जांच व्यवस्था पर भी सवाल उठेंगे?
चेकिंग अभियान हर हादसे के बाद, फिर ढील क्यों?
प्रदेश में अक्सर बड़े हादसों के बाद फिटनेस जांच, चालानी कार्रवाई और बैठकों का दौर शुरू होता है। कुछ दिन सख्ती रहती है, फिर हालात पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं।
यही कारण है कि आम लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि कार्रवाई दुर्घटना के बाद होती है, रोकथाम पहले नहीं।
यात्रियों की जान पर समझौता सबसे बड़ा अपराध
ओवरलोडिंग, पुराने वाहन, खराब वायरिंग, बंद इमरजेंसी गेट और बिना फिटनेस के चलती बसें सीधे यात्रियों की जिंदगी से जुड़ा मामला हैं। ऐसे में केवल निर्देश देना काफी नहीं होगा, बल्कि लगातार निगरानी और दोषियों पर समान रूप से कार्रवाई जरूरी होगी।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि प्रशासन की यह सख्ती स्थायी बनती है या फिर एक हादसे के बाद शुरू हुआ अभियान कुछ दिनों में फाइलों तक सीमित हो जाता है।
