दूसरे डॉक्टर के नाम पर हासिल की सरकारी नौकरी
विभागीय आदेश और बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के प्रतिवेदन के मुताबिक असली डॉ. सुनील कुमार चिकित्सा अधिकारी के पद पर देवास जिले में पदस्थ हैं। वहीं शिवकुमार पांडे पर आरोप है कि उसने डॉ. सुनील कुमार सिंह के नाम शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल कर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और स्वास्थ्य विभाग में संविदा चिकित्सक की नौकरी हासिल कर ली। वह कई वर्षों तक बिरसा और दमोह क्षेत्र में काम करता रहा। इस दौरान उसे प्रभारी बीएमओ की जिम्मेदारी भी मिली। इतने लंबे समय तक सरकारी व्यवस्था में काम करने के बावजूद उसकी वास्तविक पहचान सामने नहीं आ सकी।
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि एक ही डॉक्टर के नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल कर दो अलग-अलग व्यक्तियों के सरकारी सेवा में होने का मामला लंबे समय तक विभागीय निगरानी से बाहर रहा। अब जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि नियुक्ति के समय दस्तावेजों का सत्यापन किस तरह हुआ और आरोपी इतने वर्षों तक जांच से कैसे बचा रहा।
2024 में शिकायत के बाद भी नहीं खुला मामला
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में भी बिरसा में पदस्थ डॉ. सुनील सिंह की डिग्री को लेकर शिकायत की गई थी। उस समय जांच के बाद आरोपी को क्लीनचिट दे दी गई थी। तत्कालीन बालाघाट सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडे ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए बताया था कि शिकायत मिलने पर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर रीवा मेडिकल कॉलेज से संपर्क किया गया था। उनके अनुसार कॉलेज की ओर से बताया गया था कि सुनील सिंह नाम का व्यक्ति वहां पढ़ा था और उसने पढ़ाई पूरी की थी। इसी जानकारी के आधार पर उस समय कार्रवाई की गई थी।
हालांकि अब सामने आए मामले ने पिछली जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि क्या मूल डॉक्टर के दस्तावेजों और आरोपी की पहचान का आपस में मिलान किया गया था। क्या मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर की स्वतंत्र रूप से जांच हुई थी और क्या देवास में पदस्थ असली डॉक्टर के रिकॉर्ड से तुलना की गई थी। इन सवालों के जवाब विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएंगे।
भास्कर की खबर के बाद राज्य स्तर पर जांच
दैनिक भास्कर डिजिटल पर दस्तावेजों के साथ खबर प्रकाशित होने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने राज्य स्तर पर जांच समिति गठित की। जांच में बालाघाट में डॉ. सुनील कुमार सिंह के नाम से नौकरी करने वाले व्यक्ति की पहचान शिवकुमार पांडे के रूप में किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद बिरसा थाने में उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई।
पुलिस आरोपी की तलाश में रीवा जिले के बड़ागांव और खुटेही क्षेत्र तक पहुंची। पुलिस के मुताबिक स्थानीय लोगों ने तस्वीर देखकर व्यक्ति की पहचान शिवकुमार पांडे के रूप में की। खुटेही स्थित मकान पर पहुंचने पर उसके बेटे और बेटी ने भी तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति को अपना पिता बताया। हालांकि पुलिस की दबिश के दौरान आरोपी घर पर नहीं मिला।
पुलिस को आरोपी की तलाश और संपत्ति की जांच
प्रभारी बीएमओ डॉ. नरेश मारन की शिकायत पर शिवकुमार पांडे के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) 340(2) और 336(3) के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस अब आरोपी की गिरफ्तारी के साथ उसकी चल और अचल संपत्ति का विवरण भी जुटा रही है। इसके लिए रीवा की गुढ़ और हुजूर तहसीलों को पत्र भेजे गए हैं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार आरोपी की तलाश के लिए टीमें बनाई गई हैं और उस पर इनाम भी घोषित किया गया है।
यह मामला केवल कथित फर्जी नियुक्ति तक सीमित नहीं है बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में दस्तावेजों के सत्यापन और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करता है। मरीजों के इलाज से जुड़े पदों पर नियुक्ति के दौरान शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल रजिस्ट्रेशन की सही जांच बेहद जरूरी है। अब जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि कथित फर्जीवाड़ा कैसे हुआ और इतने वर्षों तक संबंधित विभाग को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिल सकी।
