यह फैसला अपर सत्र न्यायाधीश विश्व दीपक तिवारी की अदालत ने सुनाया जिसमें यह स्पष्ट रूप से साबित हुआ कि तीनों आरोपियों ने पहले शिल्पु के साथ शराब पी और फिर उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी। इसके बाद शव को होटल की चौथी मंजिल से नीचे फेंककर इसे आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई।
घटना 7 अगस्त 2016 की रात की है जब शिल्पु भदौरिया अपने दोस्तों के साथ आरएनटी मार्ग स्थित होटल लेमन ट्री के कमरे नंबर 418 में रुकी हुई थी। उसके साथ आशुतोष जोहरे शैलेंद्र सारस्वत और नीरज दंडोतिया मौजूद थे। शुरुआत में इन लोगों ने पुलिस को बताया था कि शिल्पु ने गैलरी से कूदकर आत्महत्या की है लेकिन जांच में यह कहानी झूठी साबित हुई।
जांच के दौरान पुलिस को घटनास्थल से कई अहम सबूत मिले जिससे यह स्पष्ट हुआ कि हत्या से पहले शिल्पु के साथ संघर्ष हुआ था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि उसकी मौत गिरने से नहीं बल्कि दम घुटने से हुई थी। इसके अलावा उसके नाखूनों में आरोपियों की त्वचा के निशान भी पाए गए जिससे संघर्ष की पुष्टि हुई।
कोर्ट में पेश किए गए साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर यह साबित हुआ कि आरोपियों ने हत्या को आत्महत्या का रूप देने की पूरी कोशिश की थी और सबूत मिटाने का भी प्रयास किया था। लेकिन जांच एजेंसियों की गहन पड़ताल और गवाहों के बयानों के कारण पूरा सच सामने आ गया।अदालत ने तीनों आरोपियों को हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है साथ ही साक्ष्य छिपाने के अपराध में 7-7 साल की अतिरिक्त सजा और आर्थिक दंड भी लगाया गया है।
इस फैसले के साथ ही शिल्पु भदौरिया के परिवार को लंबे संघर्ष के बाद न्याय मिला है और यह मामला एक बार फिर यह संदेश देता है कि अपराध कितना भी छुपाने की कोशिश की जाए कानून अंततः सच को सामने ला ही देता है।
