जलाभिषेक से पंचामृत तक, परंपराओं का पूर्ण निर्वाह
पूजन की शुरुआत गर्भगृह में स्थापित देव प्रतिमाओं के पूजन से हुई, जिसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया। ‘हरिओम’ मंत्रों के साथ जल अर्पित कर भगवान का ध्यान किया गया और कपूर आरती उतारकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया गया।
भांग-चंदन और त्रिपुंड तिलक से राजा स्वरूप श्रृंगार
अभिषेक के बाद भगवान महाकाल को भांग, चंदन और त्रिपुंड तिलक अर्पित किया गया। इसके साथ ही आभूषणों से सुसज्जित कर उन्हें राजा स्वरूप में सजाया गया। जटाधारी स्वरूप में सजे भगवान महाकाल की छवि अत्यंत मनमोहक और दिव्य प्रतीत हो रही थी, जिसे देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
फूलों की सुगंध और भोग से महका मंदिर परिसर
भगवान महाकाल को मोगरा और गुलाब के सुगंधित फूलों से सजाया गया। इसके साथ ही फल और मिष्ठान का भोग अर्पित किया गया। पूरे मंदिर परिसर में भक्ति और आस्था का वातावरण बना रहा, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर के साक्षी बने।
महा निर्वाणी अखाड़े द्वारा भस्म अर्पण की परंपरा
भस्म आरती के दौरान महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसका धार्मिक महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है।
आस्था का अद्वितीय संगम, भक्तों की उमड़ी भीड़
भस्म आरती में शामिल होने के लिए देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। मंगलवार को भी बड़ी संख्या में भक्तों ने इस दिव्य आरती में भाग लिया और बाबा महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त किया।
