मनजीत सिंह का जन्म 10 अक्टूबर 1988 को हुआ था। उन्हें कम उम्र से ही नौकायन में दिलचस्पी थी। भारत में रोइंग ऐसा खेल रहा है जिसे क्रिकेट और हॉकी जैसे लोकप्रिय खेलों की तुलना में सीमित पहचान मिली है। इसके बावजूद मनजीत ने इस चुनौतीपूर्ण खेल को अपना करियर बनाने का फैसला किया। उन्होंने 17 साल की उम्र में रोइंग की शुरुआत की और लगातार अभ्यास के जरिए अपनी क्षमता को निखारा। इस दौरान उन्हें इस्माइल बेग और बजरंग लाल जैसे प्रशिक्षकों का मार्गदर्शन मिला। मनजीत अपने करियर में कोच इस्माइल बेग को अपनी सबसे बड़ी प्रेरणाओं में से एक मानते हैं।
उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जूनियर नेशनल प्रतियोगिताओं में सिल्वर मेडल जीतने के बाद उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने का अवसर मिला। वह हैदराबाद में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में एशियन जूनियर चैंपियनशिप की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें राष्ट्रीय टीम से बुलावा मिला। यह उनके करियर का अहम पड़ाव था जिसने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचने का रास्ता खोला। इसके बाद उन्होंने लगातार मेहनत की और भारतीय रोइंग टीम में अपनी जगह मजबूत की।
मनजीत सिंह ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक और 2012 के लंदन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। पुरुषों की लाइटवेट डबल स्कल्स स्पर्धा में उन्होंने भारतीय टीम के लिए हिस्सा लिया। इस स्पर्धा में उनके साथी देवेंद्र खंडवाल और संदीप कुमार रहे। ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। मनजीत ने अपनी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया और भारतीय नौकायन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में योगदान दिया।
उनके करियर में 2010 के ग्वांग्झू एशियन गेम्स का भी खास महत्व रहा। इन खेलों में उन्होंने दो अलग-अलग स्पर्धाओं में भारत के लिए पदक जीते। रोइंग में सफलता हासिल करने के लिए ताकत के साथ संतुलन और तालमेल की भी जरूरत होती है। खिलाड़ियों को पानी की परिस्थितियों के अनुसार अपनी गति बनाए रखनी पड़ती है और पूरी टीम को एक लय में प्रदर्शन करना होता है। मनजीत ने अपने अनुभव और निरंतर अभ्यास के जरिए इन चुनौतियों का सामना किया।
खेल के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान को देखते हुए अगस्त 2020 में उन्हें ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार खेलों में आजीवन योगदान के लिए दिया जाता है। सम्मान मिलने पर मनजीत ने इसे अपने लिए बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया था। उनके लिए यह पुरस्कार वर्षों की मेहनत और इंतजार का परिणाम था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के बाद अब उनका ध्यान युवा खिलाड़ियों को तैयार करने पर है। वह नई प्रतिभाओं को प्रशिक्षण देकर उनमें देश के लिए पदक जीतने का जज्बा पैदा कर रहे हैं। उनका सफर बताता है कि किसी कम चर्चित खेल में भी लगन और अनुशासन के दम पर बड़ी पहचान बनाई जा सकती है।
