यह शिकायत राष्ट्रीय छात्र संघ यानी NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि विश्वविद्यालय के नाम में भोपाल शब्द होने से विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को परिसर की वास्तविक लोकेशन को लेकर भ्रम हो सकता है। शिकायतकर्ता के मुताबिक विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर सीहोर जिले के कोठरी कलां में भोपाल-इंदौर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। ऐसे में दाखिले के लिए जानकारी जुटाने वाले विद्यार्थियों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि विश्वविद्यालय का परिसर वास्तव में कहां है।
NHRC ने 22 अक्टूबर को मामले पर विचार करते हुए राज्य सरकार की रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा की। आयोग ने माना कि VIT भोपाल का नाम राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित किया गया है और विश्वविद्यालय की स्थापना मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय स्थापना एवं संचालन अधिनियम 2007 के तहत हुई है। हालांकि आयोग का सवाल केवल नाम की वैधानिकता तक सीमित नहीं है। आयोग ने यह जानना चाहा है कि जब विश्वविद्यालय का कानूनी नाम भोपाल है और उसका वास्तविक परिसर दूसरे जिले में स्थित है तो क्या इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में स्थान को लेकर गलत धारणा बनने की आशंका है।
आयोग के अनुसार राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट में इस महत्वपूर्ण सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। इसलिए अतिरिक्त रिपोर्ट के जरिए स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए गए हैं। आयोग ने विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट प्रॉस्पेक्टस और विज्ञापनों में परिसर की वास्तविक लोकेशन के उल्लेख को लेकर भी जानकारी मांगी है। इस पहलू को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिले से पहले विद्यार्थी और अभिभावक अक्सर वेबसाइट और प्रचार सामग्री के आधार पर निर्णय लेते हैं। ऐसे में संस्थान का नाम और परिसर का पता स्पष्ट रूप से बताना जरूरी है ताकि किसी तरह की गलतफहमी न हो।
शिकायत में विश्वविद्यालय परिसर में कथित अनधिकृत क्लिनिक संचालित होने और पूर्व में अशांति की घटनाओं से जुड़े आरोप भी लगाए गए थे। आयोग ने पाया कि राज्य सरकार की रिपोर्ट में इन आरोपों की जांच की स्थिति का उल्लेख नहीं है। अब सरकार को यह भी बताना होगा कि इन मामलों की जांच हुई है या नहीं और यदि हुई है तो उसके निष्कर्ष क्या रहे हैं। फिलहाल इन आरोपों को लेकर आयोग ने कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और न ही किसी पक्ष की गलती प्रमाणित की है।
इस मामले में अगला कदम राज्य सरकार की अतिरिक्त रिपोर्ट के बाद सामने आएगा। रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के वैधानिक नाम और वास्तविक लोकेशन के बीच संबंध प्रचार सामग्री में दी जाने वाली जानकारी और शिकायत में लगाए गए अन्य आरोपों पर कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी होगी। इसके बाद आयोग उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार कर सकता है। फिलहाल विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि विश्वविद्यालय के नाम को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट होने के बावजूद विद्यार्थियों को परिसर की वास्तविक लोकेशन की जानकारी किस तरह दी जा रही है।
शॉर्ट डिस्क्रिप्शन
VIT भोपाल के नाम और सीहोर जिले में स्थित परिसर की लोकेशन को लेकर NHRC ने मध्यप्रदेश सरकार से अतिरिक्त रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने वेबसाइट और विज्ञापनों में पते की जानकारी के साथ कथित अनधिकृत क्लिनिक और अशांति से जुड़े आरोपों की जांच पर भी जवाब मांगा है।
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VIT Bhopal, NHRC, NSUI, Madhya Pradesh News, Higher Education1. VIT भोपाल की वेबसाइट और विज्ञापनों की भी होगी जांच, NHRC ने पूछा- कैंपस की असली लोकेशन छात्रों को स्पष्ट बताई जाती है या नहीं
मूल खबर
वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी VIT भोपाल विश्वविद्यालय के नाम और उसके वास्तविक परिसर की लोकेशन को लेकर विवाद गहरा गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी NHRC ने इस मामले में मध्यप्रदेश सरकार की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए अतिरिक्त रिपोर्ट और कार्रवाई प्रतिवेदन मांगा है। आयोग ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर जानकारी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तारीख 29 नवंबर निर्धारित की गई है। अब इस मामले में विश्वविद्यालय के नाम के साथ उसकी वेबसाइट प्रॉस्पेक्टस और विज्ञापनों में परिसर का पता किस तरह बताया जाता है यह भी जांच के दायरे में रहेगा।
यह शिकायत राष्ट्रीय छात्र संघ यानी NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि विश्वविद्यालय के नाम में भोपाल शब्द होने से विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को परिसर की वास्तविक लोकेशन को लेकर भ्रम हो सकता है। शिकायतकर्ता के मुताबिक विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर सीहोर जिले के कोठरी कलां में भोपाल-इंदौर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। ऐसे में दाखिले के लिए जानकारी जुटाने वाले विद्यार्थियों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि विश्वविद्यालय का परिसर वास्तव में कहां है।
NHRC ने 22 अक्टूबर को मामले पर विचार करते हुए राज्य सरकार की रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा की। आयोग ने माना कि VIT भोपाल का नाम राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित किया गया है और विश्वविद्यालय की स्थापना मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय स्थापना एवं संचालन अधिनियम 2007 के तहत हुई है। हालांकि आयोग का सवाल केवल नाम की वैधानिकता तक सीमित नहीं है। आयोग ने यह जानना चाहा है कि जब विश्वविद्यालय का कानूनी नाम भोपाल है और उसका वास्तविक परिसर दूसरे जिले में स्थित है तो क्या इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में स्थान को लेकर गलत धारणा बनने की आशंका है।
आयोग के अनुसार राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट में इस महत्वपूर्ण सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। इसलिए अतिरिक्त रिपोर्ट के जरिए स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए गए हैं। आयोग ने विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट प्रॉस्पेक्टस और विज्ञापनों में परिसर की वास्तविक लोकेशन के उल्लेख को लेकर भी जानकारी मांगी है। इस पहलू को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिले से पहले विद्यार्थी और अभिभावक अक्सर वेबसाइट और प्रचार सामग्री के आधार पर निर्णय लेते हैं। ऐसे में संस्थान का नाम और परिसर का पता स्पष्ट रूप से बताना जरूरी है ताकि किसी तरह की गलतफहमी न हो।
शिकायत में विश्वविद्यालय परिसर में कथित अनधिकृत क्लिनिक संचालित होने और पूर्व में अशांति की घटनाओं से जुड़े आरोप भी लगाए गए थे। आयोग ने पाया कि राज्य सरकार की रिपोर्ट में इन आरोपों की जांच की स्थिति का उल्लेख नहीं है। अब सरकार को यह भी बताना होगा कि इन मामलों की जांच हुई है या नहीं और यदि हुई है तो उसके निष्कर्ष क्या रहे हैं। फिलहाल इन आरोपों को लेकर आयोग ने कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और न ही किसी पक्ष की गलती प्रमाणित की है।
इस मामले में अगला कदम राज्य सरकार की अतिरिक्त रिपोर्ट के बाद सामने आएगा। रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के वैधानिक नाम और वास्तविक लोकेशन के बीच संबंध प्रचार सामग्री में दी जाने वाली जानकारी और शिकायत में लगाए गए अन्य आरोपों पर कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी होगी। इसके बाद आयोग उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार कर सकता है। फिलहाल विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि विश्वविद्यालय के नाम को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट होने के बावजूद विद्यार्थियों को परिसर की वास्तविक लोकेशन की जानकारी किस तरह दी जा रही है।
