लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी पेशे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि न्यायिक और कानूनी संस्थाओं में संतुलित भागीदारी समय की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार करने के उद्देश्य से विभिन्न स्तरों पर कई पहलें शुरू की गई हैं और भविष्य में भी इस दिशा में प्रयास जारी रहेंगे।
कार्यक्रम के दौरान उनसे यह सवाल पूछा गया कि बड़ी संख्या में छात्राएं कानून की पढ़ाई तो करती हैं, लेकिन करियर के मध्य चरण तक पहुंचते-पहुंचते अनेक महिलाएं इस पेशे से बाहर हो जाती हैं। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह एक वास्तविक समस्या है और इसे केवल नीतिगत घोषणाओं से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए संस्थागत समर्थन, समान अवसर और पेशेवर विकास के अनुकूल वातावरण तैयार करना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि पहले भी उन्होंने सुझाव दिया था कि सरकारी पैनलों में लॉ ऑफिसर के पदों पर महिलाओं की नियुक्तियों का अनुपात 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की पर्याप्त मौजूदगी न केवल प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है बल्कि न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित और समावेशी भी बनाती है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बार काउंसिल, जिला बार एसोसिएशन और अन्य बार संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। उनका उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें महिला वकीलों को नेतृत्व के अवसर भी मिल सकें। उन्होंने संकेत दिया कि संस्थागत सुधारों के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी को स्थायी रूप से मजबूत करने की योजना पर कार्य जारी है।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे के अलावा मुख्य न्यायाधीश ने भारत की न्यायिक व्यवस्था के भविष्य को लेकर भी महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत को अपने संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक वास्तविकताओं, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप एक स्वदेशी न्यायशास्त्र विकसित करना चाहिए। उनके अनुसार, भारतीय अदालतों को ऐसे कानूनी सिद्धांतों और व्याख्याओं को बढ़ावा देना चाहिए जो देश की विशिष्ट आवश्यकताओं और सामाजिक संदर्भों को प्रतिबिंबित करें।
उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी बदलावों के दौर में न्यायपालिका को आत्मनिर्भर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसी सोच के तहत भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तंत्र विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। उनका मानना है कि भविष्य की न्यायिक प्रक्रियाओं में तकनीक की भूमिका बढ़ेगी, इसलिए भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्वतंत्र और विश्वसनीय डिजिटल ढांचा तैयार करना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश के इन विचारों को न्यायपालिका में लैंगिक समानता, संस्थागत सुधार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। उनका संदेश स्पष्ट था कि न्याय व्यवस्था को अधिक समावेशी, प्रतिनिधिक और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाने के लिए व्यापक स्तर पर सुधारों की आवश्यकता है, जिन पर लगातार कार्य किया जा रहा है।
