अदालत ने विशेष जांच दल को घटना की पूरी श्रृंखला की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया है। जांच केवल घटना तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि घटना वाली रात के भोजन से लेकर अंतिम संस्कार तक की सभी परिस्थितियों की बारीकी से समीक्षा की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा है कि जांच एजेंसी किसी भी व्यक्ति से पूछताछ कर सकती है और जरूरत पड़ने पर नए तथ्यों को भी रिकॉर्ड में शामिल कर सकती है।
मामले में गठित विशेष जांच दल का नेतृत्व वरिष्ठ अधिकारी करेंगे और टीम को पूरी स्वतंत्रता के साथ काम करने की अनुमति दी गई है। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न बचे। जांच एजेंसी को यह भी निर्देश दिया गया है कि पीड़ित परिवार द्वारा लगाए गए सभी आरोपों का सत्यापन गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ किया जाए।
इस फैसले के बाद मामले से जुड़े कई सवाल फिर चर्चा में आ गए हैं। सबूतों से छेड़छाड़ के दावों ने पहले ही मामले को संवेदनशील बना दिया था और अब अदालत के हस्तक्षेप ने जांच की दिशा को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। माना जा रहा है कि दोबारा जांच के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो अब तक स्पष्ट नहीं हो पाए थे।
हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को तय समय सीमा के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश भी दिया है। अदालत की निगरानी में होने वाली इस जांच पर अब सभी की नजरें टिकी हुई हैं। पीड़ित परिवार ने अदालत के फैसले को राहत भरा कदम बताया है और उम्मीद जताई है कि इस बार पूरी सच्चाई सामने आएगी।
मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी प्रतिक्रिया तेज हो गई है। कई लोगों का मानना है कि अदालत का यह आदेश न्याय व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करेगा। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष जांच ही न्याय की सबसे बड़ी आधारशिला होती है।
अब सभी की निगाहें जांच एजेंसी की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यह जांच केवल एक मामले की सच्चाई सामने लाने तक सीमित नहीं मानी जा रही बल्कि इसे न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।
