मतदान प्रक्रिया में कुल 528 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें 298 ने पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया। हालांकि विधेयक को पारित करने के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो सरकार पूरी नहीं कर सकी। लंबे समय तक चली चर्चा के बाद हुए इस मतदान ने संसद में बने राजनीतिक समीकरणों को स्पष्ट कर दिया।
यह विधेयक केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संबंध परिसीमन और महिला आरक्षण की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ था। प्रस्ताव के अनुसार परिसीमन के बाद लोकसभा में महिला आरक्षण को 33 प्रतिशत तक लागू करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। लेकिन इसके गिरने के बाद इस प्रक्रिया में और देरी की संभावना बढ़ गई है।
करीब 21 घंटे चली बहस में सरकार और विपक्ष दोनों ने अपने तर्क रखे। सरकार का कहना था कि सीटों में वृद्धि से देश के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बेहतर होगा और लोकतंत्र अधिक मजबूत बनेगा। वहीं विपक्ष ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है और कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
विपक्ष ने परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि बिना व्यापक सामाजिक और जनसंख्या आंकड़ों के बदलाव करना उचित नहीं होगा। उनका तर्क था कि यह निर्णय राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है और इससे कुछ राज्यों को नुकसान हो सकता है।
सरकार की ओर से इस सत्र में जुड़े अन्य संबंधित विधेयकों को अलग से मतदान के लिए पेश नहीं किया गया। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सभी प्रस्ताव एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग मतदान की आवश्यकता नहीं समझी गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि बहुमत होने के बावजूद आवश्यक समर्थन न मिल पाना संसद में सहमति की कमी को दर्शाता है। मतदान से पहले सरकार की ओर से विपक्ष से समर्थन जुटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।
इस घटनाक्रम के बाद अब यह संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस विधेयक में संशोधन कर दोबारा पेश कर सकती है या विपक्ष के साथ व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करेगी। फिलहाल इस असफलता के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अनिश्चितता बनी हुई है।
