नई दिल्ली । वैश्विक शतरंज के मानचित्र पर भारत के युवा ग्रैंडमास्टर रमेशबाबू प्रज्ञानंद ने एक नया और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। ओस्लो में आयोजित अत्यंत प्रतिष्ठित और दुनिया के सबसे कठिन शतरंज आयोजनों में से एक ‘नॉर्वे शतरंज टूर्नामेंट’ का खिताब जीतकर प्रज्ञानंद ने इतिहास रच दिया है। इस अभूतपूर्व सफलता के साथ ही वह इस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को जीतने वाले देश के पहले भारतीय शतरंज खिलाड़ी बन गए हैं। भारत के महानतम खिलाड़ी और पूर्व विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद भी अपने करियर में इस प्रतिष्ठित खिताब को हासिल नहीं कर सके थे, जिससे इस 20 वर्षीय युवा खिलाड़ी की उपलब्धि का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
प्रतियोगिता का अंतिम और निर्णायक दौर बेहद रोमांचक और अत्यधिक दबाव वाला रहा। अंतिम दिन की शुरुआत से पहले प्रज्ञानंद कुल 15 अंकों के साथ तालिका में तीसरे स्थान पर चल रहे थे और खिताब की रेस में पिछड़ते दिख रहे थे। हालांकि, उन्होंने अंतिम राउंड में जर्मनी के मजबूत ग्रैंडमास्टर विंसेंट कीमर के खिलाफ उत्कृष्ट मानसिक सुदृढ़ता और रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया। क्लासिकल मुकाबले में उन्होंने बेहद सधी हुई चालें चलते हुए कीमर को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस शानदार क्लासिकल जीत की बदौलत प्रज्ञानंद को पूरे 3 अंक मिले, जिससे उनका कुल स्कोर 18 अंकों पर पहुंच गया और उन्होंने अंक तालिका में शीर्ष स्थान पर कब्जा जमा लिया।
इस टूर्नामेंट के परिणाम को प्रभावित करने में अन्य वैश्विक मुकाबलों की भी बड़ी भूमिका रही। अमेरिका के दिग्गज ग्रैंडमास्टर वेसली सो अंतिम दिन अपनी बढ़त को बरकरार रखने में नाकाम रहे और उनका मुकाबला ड्रॉ पर समाप्त हुआ, जिसके बाद वे आर्मागेडन टाई-ब्रेक के फेर में फंस गए। वेसली सो की इस रणनीतिक चूक ने भारतीय ग्रैंडमास्टर के लिए खिताबी जीत के द्वार पूरी तरह खोल दिए। प्रज्ञानंद ने इस सुनहरे अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया और आक्रामक खेल दिखाते हुए अंक तालिका में निर्णायक बढ़त हासिल कर ली, जिसने उनकी खिताबी जीत पर मुहर लगा दी।
इस पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रज्ञानंद की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि विश्व के नंबर एक खिलाड़ी और पांच बार के विश्व चैंपियन मैग्नस कार्लसन के खिलाफ रही। भारतीय युवा खिलाड़ी ने कार्लसन को उनके ही घरेलू मैदान पर एक नहीं बल्कि दो बार क्लासिकल मुकाबलों में शिकस्त देकर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। विश्व नंबर वन खिलाड़ी को इस तरह लगातार दबाव में लाना प्रज्ञानंद की वैश्विक स्तर पर बढ़ती ताकत को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, इस टूर्नामेंट में भारत के नवनियुक्त विश्व चैंपियन डी गुकेश भी अपनी चुनौती पेश कर रहे थे, लेकिन उतार-चढ़ाव भरे प्रदर्शन के कारण वे खिताब की दौड़ से बाहर हो गए, जबकि प्रज्ञानंद ने भारतीय उम्मीदों को मजबूती से संभाला।
प्रज्ञानंद के लिए इस महासमर की शुरुआत बेहद धीमी और औसत रही थी, जहां शुरुआती दौर में वे लय हासिल करने के लिए संघर्ष करते दिखे थे। इसके बावजूद, टूर्नामेंट के दूसरे हाफ में उन्होंने जिस तरह की ऐतिहासिक और अदम्य वापसी की, उसने खेल समीक्षकों को बेहद प्रभावित किया है। उनकी यह जीत केवल उनकी खेल प्रतिभा का नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में शांत रहकर सटीक निर्णय लेने की उनकी अद्वितीय मानसिक क्षमता का जीवंत प्रमाण है। इस खिताबी जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रज्ञानंद आने वाले समय में विश्व शतरंज पटल पर लंबे समय तक अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
