एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एआई के आगमन से न्यायपालिका के सामने नए अवसर भी खुले हैं और कई गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं। उनके अनुसार तकनीक का सही उपयोग न्यायिक प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी बना सकता है, लेकिन इसके साथ ही इसकी सीमाओं को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि एआई का इस्तेमाल विशेष रूप से कानूनी शोध, मामलों के प्रबंधन और बड़े आंकड़ों के विश्लेषण में सहायक हो सकता है। इससे न्यायाधीशों पर पड़ने वाले प्रशासनिक दबाव को कम किया जा सकता है और कार्यक्षमता में सुधार लाया जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इन तकनीकों पर अत्यधिक निर्भरता न्याय के मूल सिद्धांतों को प्रभावित कर सकती है।
मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय तत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि किसी भी मामले में अंतिम निर्णय लेते समय न्यायाधीश की समझ, अनुभव और संवैधानिक दृष्टिकोण ही सर्वोपरि होना चाहिए। तकनीक केवल सहायता प्रदान कर सकती है, लेकिन निर्णय की जिम्मेदारी पूरी तरह मानव के पास ही रहनी चाहिए।
अपने संबोधन में उन्होंने एआई से जुड़े संभावित खतरों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि हाल के समय में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां एआई आधारित प्रणालियों ने गलत या काल्पनिक कानूनी संदर्भ प्रस्तुत किए हैं। इस तरह की त्रुटियां न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं और गलत दिशा में फैसलों को ले जा सकती हैं।
उन्होंने इसे केवल तकनीकी कमी नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बताया। उनके अनुसार यदि इन त्रुटियों को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह न्याय की गुणवत्ता और निष्पक्षता दोनों पर असर डाल सकती हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक अधिकारियों से कहा कि जब वे जटिल मामलों पर निर्णय लेते हैं, तो उन्हें गहराई से सोचने और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार एआई का उपयोग भी सोच समझकर और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनी रहे।
उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की न्यायपालिका वही होगी जो अपनी मूल पहचान को बनाए रखते हुए नए बदलावों को अपनाने में सक्षम होगी। इसके लिए निरंतर सीखने, आत्ममंथन और उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है।
