हुगली जिले के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ी रितु का सफर संघर्षों से भरा रहा है। उनके पिता राजमिस्त्री का काम करते हैं और सीमित संसाधनों के बीच परिवार ने हमेशा उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद रितु ने अपने सपनों को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। वर्षों तक लगातार अभ्यास, अनुशासन और समर्पण के साथ उन्होंने योगासन को अपना जीवन बना लिया।
अहमदाबाद में आयोजित इस ऐतिहासिक प्रतियोगिता के दौरान रितु के माता-पिता और उनके बड़े भाई भी मौजूद थे। जब रितु ने कंधों पर तिरंगा ओढ़कर अपनी जीत का जश्न मनाया तो पूरा परिवार भावुक हो उठा। यह केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं थी, बल्कि उन तमाम संघर्षों और त्यागों की भी जीत थी जो परिवार ने वर्षों तक किए थे।
रितु अपनी सफलता का बड़ा श्रेय अपने भाई को देती हैं। उनका कहना है कि उनके भाई स्वयं योगासन से जुड़े रहे हैं और हमेशा उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करते रहे। रितु बताती हैं कि उनके भाई ने कभी उन्हें पूर्ण या सर्वश्रेष्ठ नहीं कहा, बल्कि हर उपलब्धि के बाद सुधार की गुंजाइश तलाशने की सलाह दी। यही सोच उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रही है।
विश्व स्तर पर सफलता हासिल करने से पहले भी रितु राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी क्षमता साबित कर चुकी थीं। उन्होंने चेन्नई में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स और असम में हुए खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था। इन प्रतियोगिताओं से मिले अनुभव ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास प्रदान किया।
अहमदाबाद में दुनिया भर के श्रेष्ठ योगासन खिलाड़ियों के बीच रितु ने संतुलन, लचीलापन, शक्ति और तकनीकी दक्षता का शानदार प्रदर्शन किया। उनके प्रदर्शन ने निर्णायकों और दर्शकों को प्रभावित किया तथा उन्हें दो स्वर्ण पदकों का गौरव दिलाया। इस उपलब्धि ने उन्हें विश्व योगासन के उभरते सितारों में शामिल कर दिया है।
हालांकि इतनी बड़ी सफलता के बाद भी रितु खुद को मंजिल तक पहुंचा हुआ नहीं मानतीं। उनका कहना है कि यह तो उनके सफर की शुरुआत है। उनका सपना है कि योगासन को भविष्य में एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और अंततः ओलंपिक खेलों में शामिल किया जाए। वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए देश के लिए ओलंपिक पदक जीतना चाहती हैं। रितु की यह कहानी साबित करती है कि यदि संकल्प मजबूत हो और परिवार का साथ मिले, तो सीमित संसाधन भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकते।
