BNP के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने कहा कि अगर पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होता है, तो भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता नदी जल बंटवारा समझौता आगे बढ़ सकता है। उन्होंने सीधे तौर पर ममता बनर्जी सरकार को इस समझौते में सबसे बड़ी बाधा बताया। उनका कहना है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार और बांग्लादेश, दोनों ही इस समझौते को अंतिम रूप देना चाहते थे, लेकिन राज्य स्तर पर सहमति नहीं बन पाई।
बीएनपी BNP नेताओं को उम्मीद है कि अगर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनती है, तो भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई गति आएगी और सीमा व जल विवाद जैसे मुद्दों पर प्रगति हो सकती है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति दोनों देशों के रिश्तों में अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी सीमा इसी राज्य की लगती है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में है तीस्ता नदी, जो हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश पहुंचती है। इस नदी पर दोनों देशों के करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। बांग्लादेश लंबे समय से इस नदी के 50% पानी की मांग करता रहा है, जबकि भारत भी अपने हिस्से को लेकर संतुलन बनाए रखना चाहता है।
तीस्ता जल बंटवारे को लेकर प्रयास कई बार हुए, लेकिन हर बार सहमति बनने से पहले ही मामला अटक गया। 2011 में एक प्रस्ताव तैयार हुआ था, जिसमें बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी, लेकिन उस समय भी ममता बनर्जी के विरोध के चलते समझौता आगे नहीं बढ़ पाया।
राज्य सरकार का तर्क रहा है कि तीस्ता नदी में पहले ही पानी का प्रवाह कम हो चुका है और अगर अतिरिक्त पानी साझा किया गया, तो उत्तर बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है। यही वजह है कि राज्य स्तर पर इस मुद्दे पर लगातार आपत्ति जताई जाती रही है।
गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही औपचारिक समझौते हो पाए हैं। तीस्ता नदी का मुद्दा अब भी दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा लंबित जल विवाद बना हुआ है।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति का असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत-बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्तों पर भी पड़ता है। अब देखना हगा कि आने वाले समय में सियासी समीकरण बदलते हैं या फिर तीस्ता का यह विवाद यूं ही अधूरा रह जाता है।
