करैरा/शिवपुरी। नौकरी की तलाश में रोजगार मेले तक पहुंचने वाला बेरोजगार युवा पहले ही आर्थिक और मानसिक संघर्ष से गुजर रहा होता है। ऐसे में यदि रोजगार दिलाने के नाम पर उसी युवा से पैसे लिए जाएं तो यह केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि रोजगार की तलाश में भटक रहे युवाओं के भरोसे से जुड़े गंभीर सवाल का मामला बन जाता है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में आयोजित रोजगार मेले से ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां सूर्या डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़े प्रतिनिधियों पर विद्यार्थियों एवं बेरोजगार युवाओं से ₹4,210 प्रति व्यक्ति लिए जाने का आरोप लगाया गया है।

मामले को गंभीरता से लेते हुए शासकीय स्नातक महाविद्यालय, करैरा के प्राचार्य ने कलेक्टर शिवपुरी को पत्र भेजकर पूरे प्रकरण की जांच कराने, विद्यार्थियों से ली गई राशि वापस कराने तथा दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।
रोजगार मेले में नौकरी की उम्मीद, फिर पैसों की मांग-
जानकारी के अनुसार 23 जुलाई 2026 को जिला रोजगार कार्यालय, शिवपुरी द्वारा शासकीय स्नातक महाविद्यालय करैरा में युवा संगम/रोजगार मेले का आयोजन किया गया था। इसमें लगभग 200 से 300 विद्यार्थियों एवं बेरोजगार युवाओं ने हिस्सा लिया। विभिन्न कंपनियों द्वारा अभ्यर्थियों का चयन कर उन्हें ऑफर लेटर भी दिए गए।
शिकायत के अनुसार इसी रोजगार मेले में शामिल सूर्या डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रतिनिधियों द्वारा नौकरी, पंजीयन अथवा आगे की प्रक्रिया के नाम पर अभ्यर्थियों से ₹4,210 प्रति व्यक्ति राशि ली गई।
सबसे गंभीर बात यह है कि शिकायतकर्ताओं के अनुसार राशि लेने के बाद संबंधित व्यक्ति से संपर्क करना मुश्किल हो गया और फोन कॉल का जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद परेशान युवाओं ने महाविद्यालय प्रबंधन से शिकायत की।
दस्तावेजों ने बढ़ाई मामले की गंभीरता-
शिकायत के साथ विद्यार्थियों द्वारा भुगतान से संबंधित प्रमाण, मोबाइल संदेश, ऑफर/ट्रेनिंग से जुड़े दस्तावेज और अन्य कागजात उपलब्ध कराए जाने की बात महाविद्यालय के पत्र में कही गई है।
उपलब्ध दस्तावेजों में सूर्या डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स के नाम से जारी ट्रेनिंग लेटर भी दिखाई देता है, जिसमें स्टोर इंचार्ज पद, शिवपुरी जॉब लोकेशन और ₹21,500 वेतन का उल्लेख है। वहीं एक अन्य दस्तावेज में ट्रेनिंग सेंटर गेट पास जारी किए जाने की जानकारी है। इसके अलावा 4 अगस्त 2026 को ₹3,250 के भुगतान का स्क्रीनशॉट भी सामने आया है।
इन दस्तावेजों की वास्तविकता, इनके जारी होने की प्रक्रिया, राशि किस मद में ली गई और अलग-अलग दस्तावेजों का आपस में क्या संबंध है—इन सभी बिंदुओं की प्रशासनिक स्तर पर निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
सवाल सिर्फ ₹4,210 का नहीं, बेरोजगारों के भरोसे का है-
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू आर्थिक रूप से कमजोर और रोजगार की तलाश में भटक रहे युवाओं की स्थिति है। रोजगार मेले में आने वाला युवा नौकरी पाने की उम्मीद लेकर पहुंचता है, न कि नौकरी पाने के लिए अपनी जेब से रकम देने के दबाव में।
यदि जांच में यह साबित होता है कि नौकरी या रोजगार दिलाने के नाम पर अभ्यर्थियों से अनुचित तरीके से धन वसूला गया, तो यह बेरोजगार युवाओं की मजबूरी का फायदा उठाने का गंभीर मामला होगा।
रोजगार मेलों का उद्देश्य युवाओं को कंपनियों और रोजगार के अवसरों से जोड़ना है। ऐसे मंच पर यदि किसी अभ्यर्थी से अनधिकृत राशि वसूली जाती है, तो इससे न केवल संबंधित युवाओं को आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि सरकारी रोजगार मेलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
कलेक्टर से जांच और कार्रवाई की मांग-
महाविद्यालय के प्राचार्य ने कलेक्टर से पूरे मामले की जांच कराने का अनुरोध किया है। साथ ही विद्यार्थियों से ली गई राशि वापस कराने तथा जांच में दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
अब प्रशासन के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं—
क्या रोजगार मेले में अभ्यर्थियों से कोई राशि लेने की अनुमति थी?
₹4,210 की राशि किस मद में ली गई?
राशि किस व्यक्ति या संस्था के खाते में गई?
कितने अभ्यर्थियों से पैसा लिया गया?
क्या संबंधित कंपनी को इस तरह की वसूली की जानकारी थी?
जारी किए गए ऑफर लेटर और ट्रेनिंग दस्तावेज वास्तविक हैं या नहीं?
यदि राशि लेना अधिकृत नहीं था तो युवाओं की रकम वापस कौन करेगा?
और सबसे अहम—बेरोजगार युवाओं को नौकरी का भरोसा देकर उनसे पैसा लेने की स्थिति कैसे पैदा हुई?
प्रशासन की जांच पर टिकी नजर-
यह मामला अभी शिकायत और आरोपों के स्तर पर है और आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन उपलब्ध शिकायत और दस्तावेजों को देखते हुए मामले को महज एक व्यक्तिगत विवाद मानकर टालना उचित नहीं होगा।
रोजगार की तलाश में निकला युवा किसी के लिए कमाई का जरिया नहीं बनना चाहिए। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर ऐसी कार्रवाई जरूरी होगी, जिससे भविष्य में रोजगार मेले जैसे संवेदनशील मंच पर बेरोजगार युवाओं की आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश करने वालों को स्पष्ट संदेश मिले।
अब निगाहें जिला प्रशासन की जांच पर हैं—क्या बेरोजगार युवाओं की रकम वापस होगी और क्या इस पूरे मामले की जिम्मेदारी तय होगी?
