करैरा(शिवपुरी)- क्षेत्र में मोहनी सागर बांध से दोनों नहरों में पानी छोड़े जाने को जनप्रतिनिधियों की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। विधायक रमेश प्रसाद खटीक और भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष रणवीर सिंह रावत ने पूजा-अर्चना कर नहरों का शुभारंभ किया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसानों को सिंचाई के लिए पानी दिलाना किसी नेता की कृपा है, या यह शासन और प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी?
यदि मोहनी सागर बांध में सिंचाई योग्य पानी उपलब्ध था, तो किसानों को बार-बार नेताओं के दरवाजे क्यों खटखटाने पड़े? आखिर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है कि जैसे ही धान की फसल को पानी की आवश्यकता हो, जल संसाधन विभाग तय प्रक्रिया के अनुसार स्वतः नहरें खोल दे? किसानों को अपनी ही संपत्ति समान जल संसाधन के लिए सिफारिशें और गुहार क्यों लगानी पड़ती है?
यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सरकारी बांध किसी राजनीतिक दल, नेता या जनप्रतिनिधि की निजी जागीर नहीं हैं। इनका निर्माण जनता के टैक्स के पैसे से हुआ है और इनमें संग्रहित पानी पर पहला अधिकार किसानों और आम जनता का है। ऐसे में पानी छोड़ने जैसी नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना केवल श्रेय लेने की राजनीति प्रतीत होती है।
यदि 24 जुलाई को कलेक्टर और अधिकारियों की बैठक के बाद ही निर्णय होना था, तो क्या उससे पहले प्रशासन को यह जानकारी नहीं थी कि धान की फसल के लिए पानी की तत्काल आवश्यकता है? क्या जल संसाधन विभाग मौसम, जलस्तर और फसल चक्र की निगरानी नहीं करता? यदि करता है, तो फिर किसानों को नेताओं के माध्यम से दबाव बनवाने की जरूरत क्यों पड़ी?
दरअसल, यह परंपरा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी चिंताजनक है, जिसमें हर सामान्य प्रशासनिक कार्य को जनप्रतिनिधियों की “मेहरबानी” के रूप में प्रचारित किया जाता है। सड़क बने तो नेता का श्रेय, बिजली आए तो नेता का श्रेय, पानी मिले तो नेता का श्रेय। फिर प्रशासन की भूमिका आखिर है क्या?
किसानों को सिंचाई का पानी मिलना स्वागतयोग्य है, लेकिन इससे कहीं अधिक जरूरी यह है कि भविष्य में ऐसी व्यवस्था विकसित हो, जिसमें किसानों को अपनी मूलभूत आवश्यकता के लिए किसी नेता के दरवाजे पर दस्तक न देनी पड़े। बांधों का पानी जनता का है और आवश्यकता पड़ने पर उसे बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के स्वतः उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यही सुशासन की असली पहचान होगी, न कि हर प्रशासनिक निर्णय को राजनीतिक उपलब्धि बनाकर प्रचारित करना।
