नई दिल्ली। देश के सबसे साफ शहरों की सूची में लगातार ऊंचा स्थान पाने वाला भोपाल एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह है स्वच्छता सर्वे का बदला हुआ तरीका और शहर की वास्तविक सफाई व्यवस्था को लेकर उठते सवाल। अब केवल ऑनलाइन वोटिंग के आधार पर रैंकिंग तय नहीं होगी, बल्कि अधिकारी खुद लोगों के बीच जाकर उनकी राय लेंगे। ऐसे में असली तस्वीर सामने आने की उम्मीद बढ़ गई है।
अब तक माना जाता रहा है कि भोपाल की साफ-सफाई व्यवस्था काफी बेहतर है, लेकिन जब जमीनी स्तर पर लोगों से बात की गई तो कई अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोग शहर की सफाई व्यवस्था से संतुष्ट नजर आए। उनका कहना है कि नियमित कचरा उठान, सड़कों की सफाई और सार्वजनिक जगहों पर स्वच्छता का स्तर पहले से बेहतर हुआ है। खासतौर पर मुख्य सड़कों और वीआईपी इलाकों में सफाई स्पष्ट दिखाई देती है।
हालांकि, दूसरी तरफ कई नागरिकों ने सफाई व्यवस्था में खामियां भी गिनाईं। लोगों का कहना है कि अंदरूनी कॉलोनियों और पुराने इलाकों में अभी भी कचरा जमा रहता है और सफाई नियमित नहीं होती। कुछ जगहों पर डस्टबिन की कमी और कचरा प्रबंधन में लापरवाही भी देखने को मिलती है। इससे साफ जाहिर होता है कि शहर के अलग-अलग हिस्सों में सफाई का स्तर एक जैसा नहीं है।
स्वच्छता सर्वे के नए फॉर्मेट में अब नागरिकों की सीधी भागीदारी बढ़ा दी गई है। अधिकारी घर-घर जाकर फीडबैक ले रहे हैं, जिससे केवल डिजिटल वोटिंग के बजाय वास्तविक अनुभव को महत्व मिलेगा। इससे यह तय होगा कि रैंकिंग सिर्फ आंकड़ों पर आधारित है या वास्तव में जमीनी हकीकत भी उतनी ही मजबूत है।
भोपाल के लिए यह एक अहम मौका है, जहां उसे अपनी छवि को बनाए रखने के साथ-साथ उन कमियों को भी दूर करना होगा, जो अब तक नजरअंदाज होती रही हैं। अगर शहर प्रशासन इन फीडबैक को गंभीरता से लेता है, तो आने वाले समय में भोपाल न केवल रैंकिंग में, बल्कि वास्तविक सफाई व्यवस्था में भी एक मिसाल बन सकता है।
