अहिरवार के जीवन में यह बदलाव कोरोना की दूसरी लहर के दौरान आया। करीब 2 मई 2021 को उनकी पत्नी का निधन हो गया था। इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। जीवन में अचानक ऐसा खालीपन आया जिसे भरना आसान नहीं था। इसी दौर में उनकी मुलाकात शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त ओपी दीक्षित से हुई। दीक्षित पहले से ही झुग्गी बस्तियों के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे थे। पत्नी के निधन के करीब चार से पांच महीने बाद अहिरवार भी उनके साथ बच्चों को पढ़ाने लगे। शुरुआत में उनके पास सिर्फ 12 से 13 बच्चे आते थे लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती चली गई।
अहिरवार का फोकस उन बच्चों पर है जिनके माता-पिता मजदूरी या दूसरे छोटे-मोटे कामों में व्यस्त रहते हैं। आर्थिक मजबूरियों के कारण कई परिवार बच्चों की पढ़ाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। ऐसे बच्चे स्कूल से दूर होने के साथ गलत संगत में पड़ने के खतरे का भी सामना करते हैं। अहिरवार का प्रयास है कि इन बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखा जाए और उन्हें ऐसा माहौल दिया जाए जिसमें वे अपने भविष्य के बारे में सोच सकें।
ग्वालियर में काम की तलाश में आने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चे भी उनकी कक्षा का हिस्सा हैं। टीकमगढ़ और छतरपुर जैसे इलाकों से परिवार रोजी-रोटी के लिए दूसरे शहरों में आते हैं। बार-बार जगह बदलने के कारण बच्चों की पढ़ाई टूट जाती है। ऐसे बच्चों को लगातार पढ़ाई से जोड़े रखना अहिरवार की पहल का अहम हिस्सा है।
सिर्फ पढ़ाने तक ही उनकी जिम्मेदारी सीमित नहीं है। वे जरूरतमंद बच्चों को कॉपी किताब और स्टेशनरी जैसी पढ़ाई की सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं। जिन बच्चों के सामने स्कूल की फीस भरने की समस्या आती है वहां वे अपनी क्षमता के अनुसार मदद करते हैं। समाजसेवी और कुछ संगठन भी समय-समय पर इस काम में सहयोग करते हैं। कई बच्चों का स्कूल में दाखिला कराने में भी उन्होंने मदद की है ताकि उनकी शिक्षा बीच में न छूटे।
शुरुआत में परिवार को भी चिंता थी कि अहिरवार अपना इतना समय बच्चों के बीच क्यों दे रहे हैं लेकिन जब इस पहल का असर दिखाई देने लगा तो परिवार ने उनका साथ देना शुरू कर दिया। अब उनके बच्चे भी इस काम में उनका समर्थन करते हैं। अहिरवार के लिए किसी बच्चे का पढ़ाई जारी रखना और आगे बढ़ना ही सबसे बड़ी खुशी है।
उनका मानना है कि जरूरतमंद की आर्थिक मदद करना निश्चित रूप से जरूरी है लेकिन शिक्षा का दान किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी बदल सकता है। इसी सोच के साथ रिटायर्ड बैंक मैनेजर ने अपने जीवन के खालीपन को बच्चों के भविष्य की रोशनी से भर दिया। 12 बच्चों से शुरू हुई उनकी छोटी सी पहल आज सैकड़ों बच्चों तक पहुंच चुकी है और यही उनके लिए पत्नी की याद को एक सार्थक दिशा देने का सबसे बड़ा जरिया बन गई है।
