गुरुवार को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसमें हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद संवेदनशील स्थानों की पहचान, निगरानी व्यवस्था और किसी संभावित आपदा से पहले चेतावनी जारी करने के उपायों पर चर्चा की गई।
बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों तथा संबंधित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके अलावा केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी तैयारियों की जानकारी साझा की।
ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी को बैठक में प्रमुख प्राथमिकता के तौर पर रखा गया। अधिकारियों से संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और बर्फ से ढके क्षेत्रों पर लगातार नजर रखने को कहा गया, ताकि वहां होने वाले बदलावों का समय रहते पता लगाया जा सके।
हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों के फटने से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आने का खतरा रहता है। ऐसे में प्रभावित होने वाले संभावित क्षेत्रों और पानी के प्रवाह के रास्तों की पहले से पहचान करना आपदा प्रबंधन की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।
बैठक में अत्यधिक जोखिम वाले स्थानों को चिह्नित करने और संभावित जलप्रवाह मार्गों का निर्धारण करने पर भी जोर दिया गया। इसका उद्देश्य खतरे की स्थिति में संबंधित प्रशासन को समय रहते सूचना देना और प्रभावित आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की कार्रवाई शुरू करना है।
केंद्रीय गृह सचिव ने जोखिम बढ़ने की स्थिति में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की सक्रिय निगरानी को जरूरी बताया। समय पर चेतावनी मिलने से प्रशासन को राहत और बचाव के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने तथा निकासी की प्रक्रिया शुरू करने का अवसर मिल सकता है।
बैठक में राज्यों ने अपने-अपने क्षेत्रों में आपदा से निपटने की तैयारियों और रणनीतियों की जानकारी दी। इसके बाद राज्य एजेंसियों, जिला प्रशासन तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि संभावित ग्लेशियल झील विस्फोट या हिमस्खलन जैसी घटनाओं से निपटने की तैयारी केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जोखिम की पहले पहचान, निवारक कदम और स्थानीय समुदायों की तैयारी को भी योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी आपदा प्रबंधन तैयारियों की नियमित समीक्षा करने की सलाह दी गई। साथ ही प्रारंभिक चेतावनी और निकासी व्यवस्था में मौजूद कमियों को पहचानकर उनमें समय रहते सुधार करने को कहा गया।
इस पूरी कवायद का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के संभावित प्रभाव को कम करना और प्रशासन की प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करना है। खास तौर पर संवेदनशील इलाकों में निगरानी, चेतावनी और स्थानीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
