यह मामला एक महिला द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसके पूर्व पति ने वर्ष 2022 में कथित रूप से बल प्रयोग करते हुए बच्चों को अपने साथ ले लिया और तब से उन्हें अपने पास रखे हुए है। याचिकाकर्ता ने इसे अवैध कस्टडी बताते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी। हालांकि अदालत ने मामले की परिस्थितियों और प्रस्तुत तथ्यों की समीक्षा के बाद याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब यह सिद्ध हो कि कस्टडी कानून के विरुद्ध है या किसी वैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल आरोप के आधार पर कस्टडी को अवैध नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब बच्चे लंबे समय से एक अभिभावक के साथ रह रहे हों और उनके कल्याण पर कोई प्रत्यक्ष खतरा सिद्ध न हो।
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि कानूनी दृष्टि से पिता को प्राकृतिक संरक्षक का दर्जा प्राप्त है, और इस आधार पर उसकी अभिरक्षा को तब तक वैध माना जाता है जब तक कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा विपरीत आदेश न दिया गया हो। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे यदि लंबे समय से किसी एक अभिभावक के साथ रह रहे हों, तो अचानक कस्टडी बदलने से उनके मानसिक और सामाजिक स्थायित्व पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसे ध्यान में रखना आवश्यक है।
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में भावनात्मक पक्ष महत्वपूर्ण होने के बावजूद निर्णय कानूनी प्रावधानों और बच्चों के सर्वोत्तम हितों के आधार पर ही लिया जा सकता है। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मामले में ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि बच्चों की वर्तमान कस्टडी गैरकानूनी है या उनके हितों के विपरीत है।
