इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल तेजी से गरमा गया है और कई नेताओं ने इसे तमिल इतिहास और सांस्कृतिक गौरव का अपमान बताया है। आलोचकों का कहना है कि राजराजा चोल प्रथम केवल एक शासक नहीं थे, बल्कि उन्होंने तमिल सभ्यता, प्रशासन और मंदिर वास्तुकला को एक नई पहचान दी थी। उनके शासनकाल को भारतीय इतिहास में सुव्यवस्थित प्रशासन और सांस्कृतिक उत्कर्ष के लिए जाना जाता है।
राजराजा चोल प्रथम ने तंजावुर में बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया था, जिसे द्रविड़ स्थापत्य कला का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है। उनके नेतृत्व में चोल साम्राज्य का विस्तार दक्षिण भारत से आगे बढ़कर श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया तक पहुंचा था। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए कई राजनीतिक नेताओं का कहना है कि ऐसी तुलना सार्वजनिक विमर्श में सावधानी के साथ की जानी चाहिए।
विवाद के बाद विपक्षी और सत्तारूढ़ दोनों ही पक्षों से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ नेताओं ने मांग की है कि कमल हासन को अपने बयान को वापस लेकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। उनका मानना है कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की तुलना राजनीतिक संदर्भों में करना जनभावनाओं को प्रभावित कर सकता है और इससे सांस्कृतिक सम्मान को ठेस पहुंच सकती है।
इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि राज्य की राजनीति में ऐतिहासिक प्रतीकों और सांस्कृतिक विरासत का उपयोग लंबे समय से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहा है। ऐसे में यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित न रहकर व्यापक राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है।
दूसरी ओर कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा मामला चुनावी माहौल में जनभावनाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों का हिस्सा बन सकता है। तमिलनाडु में सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक गौरव हमेशा से राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।
वर्तमान स्थिति में यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह इतिहास, राजनीति और जनभावनाओं के बीच टकराव का एक बड़ा उदाहरण बन गया है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और अधिक तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
