सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अंबानी की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि इस स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय की टिप्पणियों का अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि संबंधित मामलों की सुनवाई अभी जारी है। साथ ही अदालत ने लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई का निर्देश दिया और कहा कि कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्प अंबानी के लिए खुले रहेंगे।
सुनवाई के दौरान अंबानी की ओर से दलील दी गई कि उनके खातों को धोखाधड़ी के रूप में वर्गीकृत करना उनके लिए बेहद गंभीर परिणाम पैदा करेगा और इससे उनकी आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति पर गहरा असर पड़ेगा। यह भी कहा गया कि इस तरह का वर्गीकरण किसी व्यक्ति के व्यावसायिक जीवन को लगभग समाप्त करने जैसा हो सकता है।
दूसरी ओर अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मामले में सार्वजनिक धन से जुड़े गंभीर आरोपों की जांच चल रही है, इसलिए इस स्तर पर राहत देना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ऋणदाता बैंकों द्वारा किए गए निर्णयों को आसानी से बदला नहीं जा सकता, क्योंकि वे अपने संसाधनों और प्रक्रियाओं के आधार पर निर्णय लेते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि में बैंकों द्वारा कराए गए फोरेंसिक ऑडिट की रिपोर्ट शामिल है, जिसके आधार पर ऋण खातों के उपयोग और लेनदेन की जांच की गई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर बैंकों ने खातों को धोखाधड़ी की श्रेणी में रखने की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसे चुनौती दी गई थी।
इससे पहले उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने इस प्रक्रिया पर अस्थायी रोक लगा दी थी, लेकिन बाद में खंडपीठ ने उस रोक को हटाते हुए बैंकों के पक्ष में फैसला दिया था। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, जहां अब राहत से इनकार कर दिया गया है।
फिलहाल संबंधित दीवानी मुकदमे लंबित हैं और अंतिम निर्णय आना बाकी है। अदालत के निर्देश के अनुसार इन मामलों की सुनवाई को तेज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, जिससे पूरे विवाद पर स्पष्ट स्थिति सामने आ सकेगी।
