इन 64 देशों में केवल छोटे या संकटग्रस्त देश ही नहीं हैं। चीन जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था भी इस बदलाव का सामना कर रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला चीन अपने जनसंख्या शिखर को पार कर चुका है और अब वहां आबादी हर साल कम हो रही है। दक्षिण कोरिया में फर्टिलिटी रेट करीब 0.72 रह गई है। मौजूदा रुझान जारी रहा तो इस सदी के अंत तक उसकी आबादी आधे से भी कम रह सकती है। जापान और थाईलैंड भी इसी दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं।
कौन-कौन से देश आबादी के शिखर से आगे निकल चुके?
महाद्वीपों के हिसाब से देखें तो पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में चीन, हांगकांग, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड इस चरण में पहुंच चुके हैं।
यूरोप में इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रिया की आबादी अपने उच्चतम स्तर को पार कर चुकी है। कैरिबियन और लैटिन अमेरिका में क्यूबा, प्यूर्टो रिको, जमैका, उरुग्वे, डोमिनिका, मार्टिनिक, गुआदेलूप, कुराकाओ, मोंटसेराट, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट मार्टिन, सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडींस, यूएस वर्जिन आइलैंड्स और फॉकलैंड आइलैंड्स जैसे क्षेत्र भी इस सूची में शामिल हैं।
यूरोप और जापान इस बदलाव को काफी पहले महसूस करना शुरू कर चुके थे। जापान में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का असर बाजार तक में दिखाई देता है। वहां बच्चों के खिलौनों और डायपर की तुलना में बुजुर्गों के डायपर की बिक्री अधिक हो गई है। बच्चों की संख्या घटने से हजारों स्कूल बंद हो चुके हैं। पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे पूर्वी यूरोपीय देशों में कम जन्मदर के साथ युवाओं का दूसरे देशों की ओर पलायन भी आबादी घटने की बड़ी वजह है।
2.1 बच्चे भी नहीं हो रहे पैदा
किसी देश की आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की जरूरत मानी जाती है। इसे ‘रिप्लेसमेंट रेट’ कहा जाता है। लेकिन दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी ऐसे देशों में रह रही है, जहां प्रजनन दर इस स्तर से काफी नीचे जा चुकी है।
इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक दोनों कारण हैं। महानगरों में घर, बच्चों की परवरिश, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च परिवारों के फैसलों को प्रभावित कर रहा है। कई दंपती एक से ज्यादा बच्चे की जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं। दूसरी ओर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। करियर को प्राथमिकता देना, देर से शादी करना या बच्चे न पैदा करने का फैसला अब पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्य हो रहा है। इन सामाजिक बदलावों का सीधा असर जनसंख्या के आंकड़ों पर पड़ रहा है।
बाकी दुनिया के लिए खतरे की घंटी
आज जिन देशों में आबादी बढ़ रही है, उनके लिए यह बदलाव भविष्य का संकेत है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 का दशक आते-आते ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेंटीना जैसे दक्षिण अमेरिकी देश भी अपने जनसंख्या शिखर के करीब पहुंच जाएंगे।
भारत के लिए यह मोड़ 2060 के दशक में आने का अनुमान है। वर्तमान में दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत उस दशक में करीब 170 करोड़ की आबादी के साथ अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकता है। इसके बाद यहां भी आबादी घटने का दौर शुरू होने का अनुमान है।
पूरी दुनिया के स्तर पर जनसंख्या का शिखर करीब 2084 में दिखाई दे सकता है। तब वैश्विक आबादी लगभग 10.3 अरब तक पहुंचकर अपने उच्चतम स्तर पर होगी और इसके बाद मानव इतिहास में पहली बार दुनिया की कुल आबादी का ग्राफ लगातार नीचे जाने लगेगा।
अमेरिका की आबादी क्यों नहीं घट रही?
कम जन्मदर के बावजूद अमेरिका फिलहाल इस संकट से उसी तरह प्रभावित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक इस सदी के अंत तक भी अमेरिका अपनी आबादी के शिखर पर नहीं पहुंचेगा। इसकी बड़ी वजह इमिग्रेशन है। अमेरिका में हर साल बड़ी संख्या में विदेशी युवा पहुंचते हैं और वहां बसते हैं। इससे कम जन्मदर के कारण पैदा हुई आबादी की कमी काफी हद तक पूरी हो जाती है।
कम लोग, लेकिन ज्यादा बुजुर्ग
आबादी घटने का सबसे बड़ा असर रोजगार बाजार पर पड़ेगा। कामकाजी उम्र की आबादी कम होने पर कंपनियों को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा।
दूसरी चुनौती पेंशन और हेल्थकेयर की होगी। टैक्स देने वाले युवा कम होंगे, जबकि पेंशन और इलाज पर निर्भर बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इसका मतलब सरकारों के राजस्व पर दबाव और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता खर्च होगा।
इमिग्रेशन बनेगा आर्थिक ताकत का आधार
भविष्य में वे देश ज्यादा मजबूत स्थिति में रह सकते हैं, जो विदेशी युवाओं और कुशल कामगारों को अपने यहां आने और बसने के अवसर देंगे। इसके उलट जिन देशों की सीमाएं प्रवासियों के लिए बंद रहेंगी, उन्हें कामकाजी आबादी की कमी और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
भारत के पास डेमोग्राफिक डिविडेंड का सीमित समय
भारत और अफ्रीकी देशों के लिए यह बदलाव खास संदेश लेकर आया है। युवा आबादी इन देशों की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इस ताकत का फायदा हमेशा नहीं रहेगा। अगले 20-30 साल डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने के लिहाज से बेहद अहम हैं।
अगर इस अवधि में युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जरूरी स्किल और पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाया, तो आबादी घटने का दौर शुरू होने से पहले देश अपेक्षित आर्थिक समृद्धि हासिल नहीं कर पाएंगे।
दुनिया के 64 देशों में खाली होते स्कूल, बुजुर्ग होती आबादी और बदलती शहरों की तस्वीर बता रही है कि 21वीं सदी की चुनौती अब केवल जनसंख्या को नियंत्रित करना नहीं है। असली चुनौती ऐसी दुनिया के लिए तैयारी करना है, जहां इंसान कम और उम्रदराज आबादी ज्यादा होगी। जिन देशों की नीतियां इस बदलाव के मुताबिक समय रहते बदल जाएंगी, उनके लिए घटती आबादी संकट के बजाय नई आर्थिक ताकत बन सकती है।
