शुरुआत में अनुसूचित जाति वर्ग की ओर से मांग उठी थी कि इस बार राज्यसभा में दलित नेता को मौका दिया जाए। इस मांग को कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने प्रमुखता से उठाया और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा जैसे नेताओं का भी समर्थन मिला। इसके बाद विंध्य क्षेत्र के ब्राह्मण नेताओं ने भी सक्रियता दिखाई और उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी दावेदारी रखी।
हाल ही में विंध्य क्षेत्र के प्रतिनिधिमंडल ने जीतू पटवारी और उमंग सिंघार से मुलाकात कर यह तर्क दिया कि क्षेत्र में ब्राह्मण समाज का प्रभाव काफी अधिक है और उन्हें राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इस मुलाकात के बाद यह स्पष्ट हो गया कि पार्टी के भीतर जातीय संतुलन का मुद्दा अब और गहराता जा रहा है।
इसी बीच अब सिंधी समाज की एंट्री ने इस पूरी प्रक्रिया को और दिलचस्प बना दिया है। रीवा शहर कांग्रेस कमेटी के महामंत्री दिलीप ठारवानी ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर सिंधी समाज से प्रतिनिधि भेजने की मांग की है। उन्होंने मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को संबोधित पत्र में अपने लंबे राजनीतिक अनुभव और पार्टी के प्रति समर्पण का उल्लेख करते हुए खुद को एक योग्य दावेदार बताया है।
ठारवानी का कहना है कि सिंधी समाज का कांग्रेस के प्रति वर्षों से जुड़ाव रहा है और पार्टी को इस वर्ग को भी प्रतिनिधित्व देने पर विचार करना चाहिए। उनका मानना है कि यदि उन्हें मौका मिलता है तो वे संसद में पार्टी की विचारधारा और जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाएंगे और प्रदेशभर में संगठन को और मजबूत करेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर जातीय समीकरणों को त्रिकोणीय बना दिया है जहां दलित ब्राह्मण और सिंधी समाज तीनों अपनी अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की होगी ताकि किसी भी वर्ग की नाराजगी सामने न आए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा जैसी अहम सीट पर उम्मीदवार का चयन केवल योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस हाईकमान किस वर्ग को प्राथमिकता देता है और किस तरह इस आंतरिक दबाव को संतुलित करता है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश में राज्यसभा की यह एक सीट कांग्रेस के लिए केवल एक राजनीतिक अवसर नहीं बल्कि संगठनात्मक संतुलन की परीक्षा भी बन चुकी है। आने वाले दिनों में इस पर फैसला पार्टी की रणनीति और भविष्य की राजनीति दोनों को प्रभावित कर सकता है।
